हिंदी दिवस पर विशेष हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, हमारी संस्कृति, संस्कार,संवेदनाओं व पहचान का अभिन्न हिस्सा है ◆ ऋषि कुमार शर्मा, पूर्व उपसचिव (हिंदी अकादमी, दिल्ली)

हिंदी दिवस के अवसर पर मैं अपने अनुभव के आधार पर यह कहना चाहता हूँ कि पिछले 40 वर्षों से हिंदी की सेवा और उसके अधिकारपूर्ण प्रयोग को मैंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य माना है। लेखन हो, साहित्य-समीक्षा हो, प्रसारण हो, संपादन हो अथवा प्रशासन—हर क्षेत्र में मैंने अपनी क्षमता के अनुरूप हिंदी को आगे बढ़ाने और उसकी प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है। मेरे लिए हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, संस्कार, संवेदनाओं और राष्ट्रीय पहचान का अभिन्न हिस्सा है।

आज आवश्यकता है कि हिंदी केवल हिंदी दिवस तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे दैनिक जीवन, शिक्षा, कार्यालय, तकनीक और सामाजिक संवाद का स्वाभाविक माध्यम बने। विशेष रूप से युवाओं से मेरा आग्रह है कि वे हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग करें और आधुनिक तकनीक, इंटरनेट तथा सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदी को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएँ। हमें हिंदी बोलने और लिखने में संकोच नहीं, बल्कि गर्व महसूस होना चाहिए।

आज का डिजिटल युग है, जहाँ हिंदी में ब्लॉग, पॉडकास्ट, यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया सामग्री करोड़ों लोगों तक पहुँच रही है। यह प्रमाण है कि हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है—बस हमें उसके प्रयोग को निरंतर बढ़ाना है।

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