"गंधर्वों का गांव यहाँ हैं" : माधुरी नैथानी

कविता

विस्मृत हूँ अभिभूत हूँ मैं

शरण हिमालय की लेकर

इठलाती इतराती हूँ

शरण हिमालय की लेकर

नीलकंठ की श्वेत चोटियां

स्वागत करती रजत रश्मियां

योग बद्री की ज्ञानस्थली

है उर्वशी की जन्मस्थली

कहीं और जाऊं मैं क्योंकर

शरण हिमालय की लेकर

सतोपंथ की छांव यहाँ है

गंधर्वों का गांव यहाँ हैं

जी भर हंसती,मन भर रोती

बद्री के दरबार मे खोती

फुरसत कहाँ मुझे पलभर

शरण हिमालय की लेकर

भूल के सारा आगा पीछा

भक्ति रसों से खुद को सींचा

जन्म जन्म के पाप मैं धोऊँ

ईश्वर की भक्ति में खोऊँ

रह जाऊं इसकी बनकर

शरण हिमालय की लेकर

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