कविता,"कवि एवं रंगकर्मी’:प्रवीण कुमार

बाईस बरस पहले

कवि के पहले कविता-संग्रह

‘गिरती हैं दीवारें’ का

विमोचन हुआ

समारोह के बाद

कवि से एक युवक मिला

उसने कवि से कविता-संग्रह की

प्रति की माँग की

कवि ने सहर्ष उसे

एक प्रति भेंट की।

अगले दिन वह युवक

कवि से फिर मिला

उसने कवि से

उसकी कविताओं की प्रशंसा की

और बताया

उसकी साहित्य में बहुत रुचि है

कवि को जानकर अच्छा लगा।

दो दिन बाद वह फिर मिला

इस बार उसने कवि को

एक पुस्तक भेंट की

मराठी लेखक शिवाजी साँवत का

चर्चित उपन्यास ‘मृत्युंजय’

कवि ने उसका आभार प्रकट किया।

कवि ने उपन्यास पढ़ा

उपन्यास में सूर्य पुत्र कर्ण की

संघर्षपूर्ण जीवन-गाथा को

रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया था

कवि पढ़कर प्रेरित हुआ।

कुछ दिनों बाद उसने कवि को

एक नाटक देखने के लिए आमंत्रित किया

कवि नाटक देखने पहुँचा

नाटक मंचन के दौरान

वह युवक भी

एक लघु भूमिका में दिखाई दिया

बाद में चाय के दौरान

कवि ने उसके अभिनय की प्रशंसा की।

इस तरह

एक कवि व एक रंगकर्मी के मध्य

अपरिचय की जो दीवार थी

वह गिर गई

दोनों में मित्रता हो गई।

समय गुजरने के साथ

कवि अपने भावों को

पारदर्शिता के साथ

कविता में पिरोता रहा

उधर रंगकर्मी ने

अपने रंगकर्म का दायरा बढ़ाते हुए

रोज़मर्रा के जीवन में भी

अभिनय शुरू कर दिया

उसके अभिनय ने

कवि की सहजता को सोख लिया

उनके मध्य

वास्तविक परिचय की दीवार

उठ आई।

रंगकर्म के बहाने रंगकर्मी

एक इंद्रजाल बुनता रहा

उसे यक़ीन था

सब ख़ास-ओ-आम

उसके इंद्रजाल में उलझ जाएँगे

उसे अपना उद्धारक मान लेंगे

अपने काँधे पर बिठाकर

सत्ता के सिंहासन पर आसीन करेंगे।

मगर अफ़सोस

सिंहासन के चारों ओर

उस से सौ गुना ज़्यादा कुशल रंगकर्मी

घेरा जमाए बैठे हैं

उनका रंगकर्म

अदभुत है।

हताश-निराश रंगकर्मी

राजनीति के मंच पर

छटपटा रहा है

कवि

सिंहासन के लिए हो रहे रंगकर्म को

साक्षी भाव से देख रहा है

आनंद के साथ आज भी

अपनी कविता कह रहा है

Disclaimer: The views expressed in this article are the personal opinions of the author and do not necessarily reflect the views of MuktiDeep or its editorial team.