विभेद, दमन के खिलाफ गहन मंथन,भोपाल में जुटे देश भर के साहित्यकार।
'पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है' विषय पर तीन दिवसीय सेमिनार का आयोजन।
भोपाल (मुक्तिदीप)'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है' इस विषय पर भोपाल में 2-4 अक्टूबर 2026 को देश भर से आए हिंदी-उर्दू के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों तथा कलाकारों ने गंभीर विमर्श किया। इस विमर्श का आयोजन 'संगमन' मंच द्वारा अपनी 27वीं श्रृंखला के रूप में किया गया। इससे पूर्व मध्य प्रदेश में ग्वालियर (2008), मांडू (2011) और चंदेरी (2013) में भी 'संगमन' के आयोजन हो चुके हैं।
भोपाल में संपन्न संगमन-27 में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यों से आए साहित्यकार और बुद्धिजीवी शामिल थे। ध्यान रहे कि संगमन मंच की स्थापना का विचार वर्ष 1993 में 18 अप्रैल को कानपुर से रायबरेली की एक यात्रा के दौरान सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के पैतृक गांव गढ़ाकोला के आसपास से गुजरते हुए सामने आया था। इस यात्रा में गिरिराज किशोर (स्वर्गीय), प्रियंवद, अमरीक सिंह दीप एवं इन पंक्तियों के लेखक एक साथ थे। 'संगमन' की अवधारणा की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इस संस्था का कोई भौतिक स्वरूप और अस्तित्व नहीं है। अर्थात न तो संस्था में कोई अध्यक्ष है, न कोई सचिव और न ही कोई इसकी समिति है। इसका कोई बैनर भी नहीं है। और तो और, इसका कोई बैंक अकाउंट भी नहीं है। बावजूद इसके संगमन ने पिछले 33 वर्षों में 27 आयोजन सफलता पूर्वक संपन्न कराए हैं।
शुरू के दो संगमन कानपुर में आयोजित करने के बाद संगमन लगातार यात्रा में है और प्रायः हर वर्ष देश के किसी शहर में आयोजित किया जाता है। अब तक सात संगमन उत्तर प्रदेश में, तीन-तीन उत्तराखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश में, हिमाचल प्रदेश और झारखंड में दो-दो तथा गोवा, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात, असम में एक-एक संगमन आयोजित किए जा चुके हैं। 25 वां संगमन बिहार के मुजफ्फरपुर में वर्ष-2023 में तथा 26 वां संगमन गत वर्ष पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में आयोजित हो चुका है। इस वर्ष यानी संगमन-27 का विषय हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के उस अमर वाक्य के रूप में रखा गया था जिसमें वे पूछते हैं-पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?
उक्त के संदर्भ में, इस तीन दिवसीय आयोजन में, रचनाकारों ने विषय पर अपने-अपने ढंग से बहुत गहन, सूक्ष्म और व्यापक विमर्श और मंथन किया। उन्होंने इस विषय को न केवल एक रचनाकार, भाषा या देश के स्तर पर देखा, बल्कि इसे वैश्विक विस्तार भी दे दिया। रूस, यूक्रेन, गाजा, मध्यपूर्व, पाकिस्तान जैसे संदर्भ भी इसमें जुड़े। भारतीय समाज के मूल्य और उनके अंतर्विरोध, उसका सामाजिक ताना-बाना एवं राजनीतिक विद्रूप ये सब भी इसमें विमर्श के केंद्र में आए। दलित, आदिवासी, स्त्रियां, नक्सल समस्या और पर्यावरण की चिन्ताएं भी इस संगमन का विषय बनीं। स्टालिन, हिटलर जैसे तानाशाह इस विमर्श में शामिल हुए तो ब्रेख्त से लेकर ओरहान पामुक तक कई अंतरराष्ट्रीय लेखक भी चर्चा में रहे। अरुंधति राय भी संदर्भ में आईं। मुक्तिबोध बराबर चर्चा में रहे। 2014 के बाद के भाजपा शासन और नरेंद्र मोदी की नीतियों पर लेखकों ने खुलकर अपने विचार रखे, जिसमें अल्पसंख्यकों के प्रति उनकी नीतियों को विशेष रूप से कटघरे में खड़ा किया गया। अंततः संगमन-27 से जो बातें छन-छनकर सामने आईं उनका मतलब किसी व्यक्ति, रचनाकार विशेष या किसी पार्टी से नहीं, अपितु हर उस व्यक्ति और संस्था तथा प्रतिष्ठान, जिनमें सत्ता-प्रतिष्ठान भी शामिल हैं, की पालिटिक्स पर सवाल खड़े करना था जो मनुष्यता के साथ नहीं खड़ा है, जो वंचित, शोषित, भयाक्रांत समाज की पीड़ाओं के प्रति संवेदनशील नहीं है और जिसकी इस दुनिया को बेहतर बनाने में भागीदारी नहीं है।
आयोजन में कथाकार शिवमूर्ति का कहना था कि लेखक की राजनीति अन्याय और शोषण के खिलाफ होनी चाहिए। उनके अनुसार लेखक सत्ता का प्रतिपक्ष है और उसकी सार्थकता इस बात में है कि उसकी लिखी हुई बात आम लोगों तक पहुंचे। उर्दू लेखक खुर्शीद अकरम का कहना था कि साहित्य का संबंध करुणा से है और यह करुणा उपजती है लोगों के साथ होने वाले शोषण और अत्याचारों से। और जब इसमें सुधार नहीं होता है तो क्रोध की उत्पत्ति होती है। इस तरह साहित्य करुणा से क्रोध तक की यात्रा है। उनका यह भी कहना था कि साहित्य समाज का स्वर है। लेकिन तब जब सिर गिनाने की जरूरत हो तो साहित्यकार को उस गिनती में भी शामिल होना चाहिए।
भोपाल संगमन में वहां के आमंत्रित वरिष्ठ साहित्यकारों प्रयाग शुक्ल, राजेश जोशी, निरंजन श्रोत्रिय तथा चित्रकार विवेक की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही। भोपाल संगमन के प्रतिभागियों में शिवमूर्ति, वंदना राग, प्रत्यक्षा, ओमा शर्मा, लाल्टू, बसंत त्रिपाठी, डॉ. सिमाद्रि ओटा, लोक बाबू, खुर्शीद अकरम, महेश वर्मा, मिथिलेश प्रियदर्शी, शम्पा शाह, हरिओम राजोरिया, सीमा राजोरिया, अदनान कफील दरवेश, माणिक, पुष्कर, प्रकाश दयाल, श्रद्धा थवाईत, विजयश्री तनवीर, तस्लीम खान, बहादुर पटेल, भंवर मेघवंशी, प्रवीण शेखर, वैभव सिंह, पराग मांदले, मनीषा पांडेय, लोकेश मालती प्रकाश, चंदन पांडेय, हरखा राम आदि रचनाकारों की उपस्थिति रही।
03 अक्टूबर को संगमन-27 के प्रतिभागियों को ऐतिहासिक बौद्ध स्थल सांची की यात्रा कराई गई। सांची से लौटते हुए संगमन के प्रतिभागियों ने वह काल्पनिक कर्क रेखा भी देखी जो सांची से 18-19 किमी. की दूरी पर सलामत पुर के निकट से गुजरती है और जहां 21 जून को दोपहर 12 बजे 'शून्य परछाईं' की स्थिति बन जाती है क्योंकि तब सूर्य की किरणें बिल्कुल लंबवत पड़ती हैं।
संगमन-27 के स्थानीय संयोजक यशवंत पाराशर और चंदन पांडेय थे। यशवंत पाराशर संगमन-25 से लगातार संगमन के आयोजनों का स्थानीय संयोजन करते आ रहे हैं। संगमन-27 का समापन वक्तव्य प्रियंवद ने तथा धन्यवाद ज्ञापन यशवंत पाराशर ने किया। प्रियंवद ने संगमन के सहकारी स्वरूप तथा तक्षशिला एजूकेशन सोसाइटी के संगमन में योगदान की विशेष रूप से चर्चा की।
तक्षशिला एजूकेशन सोसाइटी तथा इकतारा ट्रस्ट की ओर से सुशील कुमार, शशि तथा उनकी पूरी टीम का प्रबंधन बेहद प्रशंसनीय था।
रिपोर्ट: वरिष्ठ साहित्यकार श्री कमलेश भट्ट 'कमल'
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