हुस्न-ए-उरियाँ भी हुस्न है गरचे - हुस्न-ए-कामिल मगर नक़ाब में है
इश्क़ का बाब जिस निसाब में है
ज़िक्र मेरा उसी किताब में है
वक़्त-ए-रुख़्सत दिया था जो उसने
उसकी ख़ुशबू भी उस गुलाब में है
इस तरह कायनात है रोशन
नूर सूरज का माहताब में है
हुस्न-ए-उरियाँ भी हुस्न है गरचे
हुस्न-ए-कामिल मगर नक़ाब में है
कौन कहता है वो नहीं मौजूद
ये अलग बात के हिजाब में है
डॉ नसीम अलीग
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