'काशी काव्य संगम' द्वारा पत्रकार इरफ़ान राही सहित कई साहित्यकार सम्मानित
सम्मानित कवियों द्वारा वाराणसी की तहज़ीब, गंगा-जमुनी संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत की सराहना
'
वाराणसी (मुक्तिदीप) हिन्दी-उर्दू के कवि, शायर, पत्रकार सैफी उर्दू सेंटर द्वारका, दिल्ली के चेयरमैन व समाजसेवी इरफ़ान राही को बनारस में काशी काव्य संगम की ओर से सम्मानित किया गया। दिल्ली से गए कवि शायरों जिनमें द्वारका दिल्ली से इरफ़ान राही, मेरठ से यास्मीन मूमल, दिल्ली से मेहफूज आलम और यास्मीन बेगम के सम्मान में बनारस रेल कारखाने की लाइब्रेरी में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें स्थानीय साहित्यकारों, कवियों और शायरों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का संचालन काशी काव्य संगम के संस्थापक अख़लाक़ ख़ान भारतीय ने किया और मेहमानों का परिचय कराया राष्ट्रीय सचिव डॉ. नसीमा निशा ने स्वागत किया और राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक सिंह बेताब ने मेहमानों का बनारस की धरती पर संस्था द्वारा सम्मानित किया।
इस अवसर पर सभी कवि कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से काव्य रस की धाराएं प्रवाहित कीं । कवि इरफ़ान राही ने काशी काव्य संगम के आयोजकों और उपस्थित कवि-शायरों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए ऐतिहासिक नगरी बनारस की धरती को सलाम किया। उन्होंने यहां के लोगों के मिलनसार स्वभाव, मोहब्बत, अपनापन और मेहमान नवाज़ी की सराहना की। उन्होंने कहा कि बनारस की खूबसूरती केवल इसकी ऐतिहासिक इमारतों और धार्मिक स्थलों में ही नहीं, बल्कि यहां की सांस्कृतिक विविधता, आपसी सद्भाव और गंगा-जमुनी तहज़ीब में भी दिखाई देती है।
इरफ़ान राही ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की विशालता, शैक्षिक महत्ता और विश्वव्यापी ख्याति का उल्लेख करते हुए बनारस की गौरवशाली शैक्षणिक परंपरा की प्रशंसा की। उन्होंने गंगा की अविरल धारा और निर्मलता के साथ शहर के ऐतिहासिक बाज़ारों, गुरुकुलों, शैक्षणिक संस्थानों तथा रामनगर किले की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता का भी ज़िक्र किया।
उन्होंने बनारस के 88 घाटों की पवित्रता और सुबह-ए-बनारस के मनमोहक दृश्य का उल्लेख करते हुए इस ऐतिहासिक नगरी की आध्यात्मिक विरासत को नमन किया। इस दौरान उन्होंने शहनाई के महान उस्ताद भारत रत्न बिस्मिल्लाह ख़ाँ को सलाम पेश किया। घाटों के निकट स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का उल्लेख करते हुए उन्होंने इन स्थलों की ऐतिहासिक महत्ता की सराहना की।
इरफ़ान राही ने देश की रक्षा, एकता और अखंडता के साथ-साथ देशप्रेम, आपसी भाईचारे और हिन्दू-मुस्लिम एकता की मजबूती के लिए प्रार्थना और दुआ की। उन्होंने गंगा-जमुनी तहज़ीब को भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत बताते हुए आपसी सद्भाव, मोहब्बत और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना को मज़बूत बनाए रखने का संदेश दिया।
बनारस प्रवास के दौरान डॉक्टर यास्मीन मूमल, इरफ़ान राही, मेहफूज आलम और उरं्दूटीचर यास्मीन बेगम ने
यहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ मशहूर खानपान और पवित्र गंगा नदी में बोटिंग का भरपूर आनंद लिया। बनारसी पान, दही-जलेबी, स्वादिष्ट नाश्ते, चटपटी चाट और मीठी रबड़ी लस्सी और पेड़े के ज़ायके ने उनके प्रवास को और भी यादगार बना दिया। उन्होंने स्थानीय बाज़ारों की रौनक, खानपान की विविधता और लोगों के आत्मीय व्यवहार की सराहना की। विवाह समारोह में शामिल होने का अनुभव भी उनके लिए यादगार रहा।
अंत में इरफ़ान राही ने काशी काव्य संगम के आयोजकों, उपस्थित कवि-शायरों और बनारस के तमाम लोगों का हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि बनारस की मोहब्बत, मेहमाननवाज़ी, सांस्कृतिक समृद्धि और गंगा-जमुनी तहज़ीब की यादें हमेशा उनके दिल में रहेंगी।
आलोक सिंह बेताब,डॉ नसीमा निशा,अख़लाक़ भारतीय, उषा पाण्डेय, आनंद कृष्णा, रामजतन पाल, धाना पूरी, टीका राम जी, गिरीश पाण्डेय, कुंवर सिंह जी, अहमद हनिफ़ी और गणेश प्रहरी सहित अन्य साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
Disclaimer: The views expressed in this article are the personal opinions of the author and do not necessarily reflect the views of MuktiDeep or its editorial team.