गबन के आरोपी को अदालत के 25 साल बाद बाइज्जत बरी किया

फर्जी आरोपों में बर्खास्ती, समाजिक जिल्लत व जेल में बिताये समय का हिसाब कौन देगा?

बिजनौर ( मुक्तिदीप) बिजनौर जिले के नजीबाबाद स्थित किसान सहकारी चीनी मिल लिमिटेड में काम करने वाले पूर्व वेयरहाउस कीपर राकेश कुमार शर्मा को अदालत ने 25 साल लंबे चले आपराधिक मुकदमे से पूरी तरह बरी कर दिया है।

अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष (पुलिस व अभियोजन विभाग) आरोपी के खिलाफ एक भी सबूत या गवाह पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा।

​हालांकि, इस फैसले ने न्याय की जीत तो तय कर दी है, लेकिन इसके साथ ही एक बेगुनाह नागरिक के 25 सालों तक हुए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न पर भी गहरा सवाल खड़ा कर दिया है।

​प्राप्त विवरण के अनुसार ​घटना वर्ष 2001 की है। थाना नजीबाबाद में केस क्राइम नंबर 417/2001 के तहत राकेश कुमार शर्मा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 409 (आपराधिक विश्वासघात) का मामला दर्ज कराया गया था। आरोप था कि चीनी मिल के वेयरहाउस कीपर के पद पर रहते हुए उन्होंने गोदाम से चीनी के लगभग 1,555 बोरे गायब कर दिए।

​पुलिस ने मामले की जांच की, नक्शा-ए-नज़री तैयार किया और राकेश शर्मा के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी। 15 जुलाई 2013 को कोर्ट ने आरोप तय किए, लेकिन राकेश कुमार शर्मा ने खुद को पूरी तरह निर्दोष बताते हुए न्याय की गुहार लगाई और ट्रायल का सामना किया।

​अदालत ने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को गवाह और सबूत पेश करने के अनगिनत मौके दिए। हैरानी की बात यह रही कि 2001 से लेकर 2026 तक चले इस लंबे मामले में पुलिस और अभियोजन पक्ष एक भी गवाह को कोर्ट के कटघरे में खड़ा नहीं कर सका।

​मामले की गंभीरता और सुप्रीम कोर्ट की पुरानी पेंडिंग फाइलों को निपटाने की कार्ययोजना को देखते हुए अदालत ने 03 अगस्त 2026 को सख्त रुख अपनाया और अभियोजन पक्ष का गवाही कराने का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। इसके बाद Cr.P.C. की धारा 313 के तहत दर्ज बयान में भी राकेश शर्मा ने खुद को बेकसूर बताया।

​मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र का बुनियादी नियम है कि किसी भी व्यक्ति पर लगा अपराध "हर उचित संदेह से परे" (Beyond Reasonable Doubt) साबित होना चाहिए। केस केवल "सच हो सकता है" के आधार पर नहीं, बल्कि "सच होना ही चाहिए" के पैमाने पर तय होता है।

​चूँकि रिकॉर्ड पर एक भी गवाह या ठोस सबूत मौजूद नहीं था, कोर्ट ने राकेश कुमार शर्मा को धारा 409 IPC के सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया।

​अदालत का यह फैसला राकेश कुमार शर्मा और उनके परिवार के लिए राहत की सांस लेकर जरूर आया है, लेकिन यह मामला हमारी न्याय व्यवस्था और पुलिसिया जांच की ढुलमुल कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े करता है। जिस आरोप को पुलिस कोर्ट में साबित करने के लिए एक गवाह तक नहीं ला सकी, उस झूठे आरोप का दंश राकेश शर्मा को पूरे 25 सालों तक झेलना पड़ा।

​इतने लंबे ट्रायल के दौरान कानूनी लड़ाई का खर्च, कोर्ट के चक्कर और समाज में गबन का आरोपी समझे जाने का मानसिक दर्द किस हद तक रहा होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

​दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री वागीश शर्मा ने इस मामले में टिप्पणी करते 'मुक्तिदीप' को बताया कि बिना पुख्ता सबूतों के किसी कर्मचारी पर केस दर्ज कर 25 सालों तक खींचना सीधे तौर पर उसके मानवाधिकारों का हनन है। राकेश शर्मा भले ही कानूनी प्रक्रिया में "बरी" हो गए हों, लेकिन जिंदगी के जो 25 साल उन्होंने अदालत के चक्कर काटते हुए गंवाए, उनकी भरपाई कोई फैसला नहीं कर सकता।

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