सम्पा: विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान, समीक्षक: रामनगीना मौर्य, लखनऊ

"सम्पा, जरूर कुछ करेगी...!"

यह वाक्य...उम्मीद, आशा, निराशा के बीच साहस, जिजिविषा, अटूट विश्वास के रूप में एक साधारण इन्सान के असाधारण कृत्यों की गाथा है।

"सम्पा - विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान", पुस्तक पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

सोमालिया के समुद्री लुटेरों से मर्चेंट नेवी में कार्यरत अपने पति सहित शिप पर सवार दूसरे और लोगों को छुड़ाने वास्ते सम्पा के अथक प्रयासों, जिसमें उसे यह तक पता नहीं था कि उसके पति किस कंपनी के किस शिप पर सवार हैं, वाबजूद इसके, पिता, मामा, रिश्तेदारों, गाँव की पंचायत, एनजीओ और मीडिया आदि की मदद से एवं विभिन्न विभागों के अधिकारियों, और मंत्रालयों में सम्पर्क करते, बड़ी- से-बड़ी हस्तियो से मिलते, वक्त ज़रूरत धरना, प्रदर्शन आदि में शामिल होते, तमाम लोगों से मदद प्राप्त करते, जिसमें कभी उम्मीद बंधती है तो कभी बिखर जाती है, ऐसी तमाम अनिश्चितताओं, बाधाओं- व्यवधानों के वाबजूद अपने संकल्प पर अडिग, अदम्य जिजिविषा का परिचय देते, अंततः लगभग ग्यारह महीने की जद्दोजहद के बाद अपने पति को अपहर्ताओं के कब्जे से छुड़ा लेने की सम्पा के अनथक प्रयासों की बेहद रोमांचक गाथा है यह कहानी। एक तरफ पति गम्भीर संकट में, तो दूसरी तरफ अपने छोटे बच्चे, परिवार की जिम्मेदारी। इस जद्दोजहद में अगर संपा पर उसके पति रविंदर का विश्वास था..."बस एक बार मेरी पत्नी सम्पा को बता देना। वह जरूर कुछ न कुछ करेगी।" (पेज 44) तो इस विश्वास पर खरा उतरने के लिए सम्पा के दृढ़ संकल्प का अंदाज़ा इसी वाक्य से होता है..."पति के लुटेरों के चंगुल में होने से ज्यादा परेशानी और क्या होगी? मेरे पति को वापस लाने के लिए अगर यहां रोज आने की जरूरत होगी, तो मैं रोज आऊँगी। पर पति को ढूँढे बिना मैं चैन से तो नहीं बैठ सकती।" (पेज 47) सम्पा के पिता ने भी इस संघर्ष में उसका मनोबल किस तरह बनाए रखा, इस वाक्य से ही समझा जा सकता है..."सुन भाई रे! दामाद रोज- रोज नए नहीं लाए जाते। दामाद तो एक ही होता है। वह ही था और वह ही आएगा।" (पेज 138) घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में सम्पा और उसके पति रविंदर की तमाम उतार- चढ़ाव से भरी प्रेमकहानी भी फ्लैशबैक में चलती रहती है।

पल- पल उतार- चढ़ाव से भरी घटनाएं इतनी तेजी से बदलती हैं कि पढ़ते समय पूरे समय रोमांच बना रहता है। कथानक किस कदर रोमांचकारी हैं, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि पेज-दर -पेज आगे जानने की कौतुहलतावश इसे मात्र दो सीटिंग में ही पढ़ गया। इस नॉन- फ़िक्शन कथा में आशा- निराशा, रोमांस, ट्रैजेडी, थ्रिल, इमोशन, कॉमेडी, ड्रामा, रहस्य, रोमांच इस कदर गुंथे पड़े हैं कि इस पर एक बेहतरीन फिल्म बन सकती है।

यह क़िताब निश्चय ही सम्पा के त्याग, जिजिविषा, दृढ़ संकल्प, की यादगार गाथा है, जो विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष से पीछे न हटने के लिए प्रतिबद्ध हर इन्सान को प्रेरित करने वाला, हौसला देने वाला है। खास तौर नारी के सन्दर्भ में पुस्तक में आया यह वाक्य ग़ौरतलब है..."पता नहीं कौन लोग हैं जो स्त्री को अबला कहा करते हैं। सम्पा ने तो अपने आसपास की स्त्रियों को हर परिस्थिति में मजबूत ही पाया, फिर वह चाहे सम्पा की माँ हो, सास या सम्पा खुद।" (पेज 142)

हाँ, सम्पा, अपने मिशन को कैसे अंजाम दे पाई, इस घटना से उसके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा, इस पुस्तक को विस्तार में पढ़कर ही जाना जा सकता है।

एक साधारण इन्सान की असाधारण गाथा को लाज़वाब भाषा- शैली में सर्वथा पठनीय कथेतर पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए लेखकद्वय, प्रकाशक निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं। पुस्तक से जुड़े सभी पक्षों को बहुत बहुत बधाई। हार्दिक शुभकामनाएं।

लेखकद्वय: मीनाक्षी चौधरी, संजीव पालीवाल

प्रकाशक: एकदा, वेस्टलैंड बुक्स

मूल्य: ₹ 399/-

Disclaimer: The views expressed in this article are the personal opinions of the author and do not necessarily reflect the views of MuktiDeep or its editorial team.