दुनिया भविष्य में, हम अतीत में: रवि अरोड़ा

पंजाबी की कहावत है ' ना मैं गिनी, ना मेरे घट्टे ' यानी जब तक हमनें अपनी जेब के सिक्के गिनें ही नहीं तब तक वे भला कम ही कैसे होंगे । कुछ यही हाल आजकल हमारा है। पूरी दुनिया में कोहराम मचा है कि आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस यानी एआई पूरी मानवता के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है मगर हम अभी भी मंदिर मस्जिद में उलझे हैं। हर मस्जिद के नीचे हमें मंदिर ढूंढने का जुनून चढ़ा है और हर बात को हम घुमा फिरा कर हिंदू मुस्लिम की बहस में तब्दील करने लगते हैं। अजब स्थिति है दुनिया भविष्य को लेकर चिंतित है और हम आज भी अतीत की गलियों में भटक रहे हैं । क्या यही वक्त नहीं है कि जब अपनी फटी जेब में हाथ डालें और देखें कि कितना कुछ हम अब तक खो चुके हैं ?

तकनीक की दुनिया की बड़ी कम्पनी एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई चेतावनी दे रहे हैं कि जल्द ही एआई इंसानी दिमाग को पीछे छोड़ देगा और वे दुनिया से इसके विकास को धीमा करने की अपील कर रहे हैं। एआई के गॉडफादर कहे जाने वाले ज्योफ्री हिंटन ने भी इस तकनीक के तेजी से बढ़ने और इंसानी अस्तित्व के लिए संभावित खतरों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। ओपन एआई के प्रमुख सैम ऑल्टमैन

और एक्सएआई के मालिक एलन मस्क भी एआई की बेलगाम रफ्तार और सुरक्षा नियंत्रणों की कमी पर खौफ़जदा हैं। दुनिया के प्रमुख उद्यमी बिल गेट्स तो यहां तक घोषणा कर रहे हैं कि भविष्य में एआई मॉडल इंसानी हितों के खिलाफ काम कर सकते हैं और हमारा उनपर नियंत्रण खत्म हो सकता है। कुल मिला कर बात यह है कि दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि शायद हमारी पिछली पीढ़ियों ने ऐसी परिवर्तनकारी गति की कल्पना भी नहीं की होगी मगर पता नहीं क्यों हम भारतीय अभी भी कबूतर की तरह आँख बंद किए बैठे हैं।

किससे छुपा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब किसी विज्ञान-कथा की चीज नहीं रह गया है। वह हमारे मोबाइल फोन, अस्पतालों, बैंकों, कारखानों, अदालतों, विश्वविद्यालयों और युद्ध के मैदान तक पहुंच चुका है। मशीनें केवल गणना नहीं कर रहीं, वे भाषा समझ रही हैं, तस्वीरें बना रही हैं, कोड लिख रही हैं, बीमारियों की पहचान में मदद कर रही हैं और वैज्ञानिक अनुसंधान की गति बढ़ा रही हैं । और इसी के साथ दुनिया का एक बड़ा हिस्सा इस सवाल पर गंभीर बहस कर रहा है कि अगर एआई का विकास बिना पर्याप्त नियंत्रण, सुरक्षा और मानवीय निगरानी के यूं ही जारी रहा तो इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे ? कुछ वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ तो यह चेतावनी तक दे रहे हैं कि अत्यधिक शक्तिशाली एआई भविष्य में मानव समाज के अस्तित्व के लिए भी गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। यह चेतावनी सही साबित होगी या अतिशयोक्ति, यह तो भविष्य बताएगा लेकिन एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि एआई की दौड़ शुरू हो चुकी है । अमेरिका, चीन और यूरोप इसके लिए अरबों डॉलर लगा रहे हैं। दुनिया की बड़ी कंपनियां एआई मॉडल, चिप्स, डेटा सेंटर और रोबोटिक्स में अभूतपूर्व निवेश कर रही हैं। विश्वविद्यालय अपने पाठ्यक्रम बदल रहे हैं। सरकारें एआई की राष्ट्रीय रणनीतियां बना रही हैं। सेनाएं एआई आधारित तकनीक विकसित कर रही हैं। और उधर, ऐसे दौर में हम क्या कर रहे हैं ? हम किस बहस में उलझे हैं ? मस्जिद के नीचे क्या था ? मस्जिद के नीचे का कुआं कितना पुराना है ? किसने किस धर्म के बारे में क्या कह दिया? किस जुलूस में कौन-सा नारा लगा ? किसने किसकी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाई ? हो सकता है कि इन सवालों के अपने ऐतिहासिक और कानूनी संदर्भ हों। लेकिन सवाल यह है कि क्या 21वीं सदी के तीसरे दशक में भारत की राष्ट्रीय ऊर्जा का इतना बड़ा हिस्सा अतीत के विवादों को लेकर ही खर्च होता रहेगा ? आज जब दुनिया भविष्य की तकनीक पर नियंत्रण पाने की लड़ाई लड़ रही हो, तब हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय विमर्श यह क्यों नहीं है कि अगले दस वर्षों में भारत एआई की दुनिया में कहां होगा ? हमारे बच्चों को क्या पढ़ाया जाएगा ? हमारी नौकरियां किस तरह बदलेंगी ? भारत अपनी भाषा में विश्वस्तरीय एआई कैसे बनाएगा ? हम अपने किसानों, डॉक्टरों, शिक्षकों और छोटे कारोबारियों तक एआई कैसे पहुंचाएंगे ? हम एआई के कारण खत्म होने वाली नौकरियों के लिए युवाओं को कैसे तैयार करेंगे ? और सबसे महत्वपूर्ण जब शक्तिशाली एआई कुछ गिनी-चुनी कंपनियों और देशों के हाथ में होगा तो भारत अपनी तकनीकी संप्रभुता कैसे बचाएगा ? मगर हम हैं कि मंदिर मस्जिद जैसे मुद्दों से ही बाहर नहीं आ रहे । यकीनन

इतिहास पर गर्व करना बुरी बात नहीं है, लेकिन क्या केवल इतिहास में जीना अच्छे भविष्य की गारंटी देता है ? क्या कारण है कि जिस देश के युवा आने वाले समय में एआई इंजीनियर, रोबोटिक्स विशेषज्ञ, डेटा वैज्ञानिक और नई तकनीकों के निर्माता बन सकते हैं, उन्हें लगातार धार्मिक पहचान और सामुदायिक टकराव की बहसों में धकेला जा रहा है ? क्यों नहीं हम समझ रहे कि एआई केवल तकनीक का विषय नहीं वरन् यह अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा, लोकतंत्र और राष्ट्रीय शक्ति का प्रश्न भी है। हम कब समझेंगे कि कल का शक्तिशाली देश वह नहीं होगा जिसके पास केवल बड़ी आबादी होगी अथवा पांच सात सौ साल पुराने मंदिर-मस्जिद होंगे बल्कि वह होगा जिसके पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली एआई चिप होगी।

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