सीन में अब बड़े खिलाड़ी की एंट्री: रवि अरोड़ा

बसपा कार्यकर्ता आर एन आर्य उत्तर प्रदेश से राज्य सभा के सदस्य थे । उनका कार्यकाल 1996 से 2002 तक रहा। पार्टी के गाज़ियाबाद कार्यालय में वे आए दिन आ बैठते थे और चूंकि मेरा घर बसपा कार्यालय के बिल्कुल पास था अतः उनसे अक्सर भेंट भी हो जाया करती थी। आगरा के बिजली विभाग में साधारण से लाइनमैन श्री आर्य का यहां उल्लेख इसलिए कि वे अक्सर ब्रेड समोसा खाकर ही पूरा दिन गुजार देते थे और उनके दो जोड़ी कपड़े भी कई बार फटे हुए नजर आते थे। उन्हीं दिनों बसपा ने अपने काडर के नौ अन्य कार्यकर्ताओं को भी विधान परिषद का सदस्य बनवाया और उन सब की भी लगभग यही हालत थी। वे सभी लोग मामूली पृष्ठभूमि से थे और अधिकांश के पास अपना मकान और वाहन तक नहीं था। बेशक उन दिनों बसपा पर विधानसभा और लोकसभा के टिकिट बेचने के आरोप लगते थे मगर पार्टी अध्यक्षा मायावती की यह खास बात थी कि वे एमएलसी और राज्य सभा सदस्य केवल पार्टी काडर को ही बनाती थीं। इसके बरक्स जब देश की दूसरी पार्टियों पर निगाह डालते थे तो दिखाई पड़ता था कि ये तमाम पार्टियां विधानसभा और लोकसभा के टिकट जिताऊ प्रत्याशी को और एमएलसी और राज्य सभा सदस्य पैसे वालों को बनाती थीं। यह क्रम कमोवेश अभी भी जारी है और इस मामले में कोई पार्टी भी किसी से पीछे नहीं है । मगर हाल ही में समाजवादी पार्टी ने मुकेश अंबानी के खासमखास अरबपति धनराज परिमल नाथवानी को राज्य सभा की टिकिट देकर तो जैसे सभी को चौंका ही दिया । बेशक आज की राजनीति में पैसे की आवश्यकता बेहद बढ़ गई है मगर इस तरह की राजनीति में क्या कार्यकर्ताओं की कोई भूमिका बची भी है या वे यूं ही जूतियां घिस रहे हैं ? और सबसे बड़ी बात यह कि हम यह ढोंग कब तक करते रहेंगे हैं कि देश की राजनीति में सभी में लिए द्वार खुले हैं ?

भारतीय राजनीति में पैसे की भूमिका तो शायद पहले दिन से ही थी मगर इसे संस्थागत मान्यता मिली 2104 में , जब लाल कृष्ण आडवाणी, शिवराज सिंह, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे खांटी के राष्ट्रीय नेताओं पर उन क्षेत्रीय नेता नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा बनाने में भाजपा ने तरजीह दी, जिन्हें देश के बड़े उद्योग समूहों अंबानी और अडानी का विश्वास हासिल था । अपने भरोसे के आदमी को प्रधानमंत्री बनवा कर अडानी अंबानी ने इसकी कीमत भी वसूली और मोदी शासन में अडानी की संपत्ति सोलह गुनी और मुकेश अंबानी की चार गुना बढ़ गई । यह आंकड़ा तब और अधिक महत्वपूर्ण लगता है जब पता चलता कि इस दौरान देश में औसत प्रति व्यक्ति आय उतनी भी नहीं बढ़ी जितनी महंगाई बढ़ गई ।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के अनुसार मुल्क में पैसे वालों को पार्टी प्रत्याशी बनाने का चलन हाल ही में बेहद बढ़ा है। जिसका नतीजा है कि वर्तमान 18वीं लोकसभा के 543 सांसदों में से 504 यानी 93 फ़ीसदी करोड़पति हैं। वहीं देश की विभिन्न राज्य विधानसभाओं के कुल मौजूदा विधायकों में से 90 फीसदी करोड़पति हैं। मिलता जुलता आंकड़ा राज्य सभा और विधान परिषदों का भी है। राज्यसभा सदस्यों की तो औसत संपत्ति ही 120 करोड़ से भी अधिक है। जाहिर है कि इनमें थोक के भाव उद्योगपति हैं मगर हैरानी की बात यह है कि इनमें खनन व्यापारी, चीनी मिल मालिक और रीयल एस्टेट एजेंट और दोयम दर्जे के व्यापारी भी हैं। मज़ाक देखिए कि हम लोग फिर भी खुद को बहलाते हैं कि देश में सत्ता की मालिक जनता है। जबकि साफ दिख रहा है कि हमारे लोकतंत्र की बागडोर पूरी तरह धनपतियों के हाथ में है और आम मतदाता व कार्यकर्ता खुद के देवतुल्य होने का खामखां वहम पाले बैठा है। यह ठीक है कि प्रचार, मीडिया, सोशल मीडिया, कार्यकर्ता, यात्राएं, सभाएं और चुनावी प्रबंधन जैसे हर कदम पर पार्टियों को पैसे की दरकार है । जाहिर है कि यह पैसा पूंजीपति ही देगा और बाद में ब्याज समेत वसूलेगा भी । इसे एक बीमारी के रूप में हम जितनी जल्दी स्वीकार कर लें, उतने ही कम परेशान होंगे मगर मेरी चिंता तो कुछ और ही है। मुझे तो आशंका हो चली है कि पूंजीपति अब खुद को केवल चंदा देने वाले की भूमिका में नहीं देख रहा, बल्कि कमान अपने हाथ में ही लेना चाहता है। संसद में 31अरबपतियों में अब एक और नाम नाथवानी का जुड़ने से ऐसी चिंताएं होना स्वाभाविक है। उसके पिता भाजपा से राज्य सभा सदस्य पहले ही हैं। हो सकता है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यह कोई मास्टर स्ट्रोक खेला हो और मोदी की ताकत माने जाने वाले अंबानी खेमे में सेंध लगा रहे हों। कांग्रेस ने पिछले कुछ समय से अंबानी के खिलाफ जिस प्रकार हमले कम किए हैं, उससे भी इस आशंका को ताकत मिलती है मगर चिंता का विषय यह है कि मास्टर स्ट्रोक कहीं हमारे लोकतंत्र पर ही भारी न पड़ जाए । किससे छुपा है कि अंबानी अडानी से भी बड़ा खिलाड़ी है।

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