ज्ञानेश कुमार को खतरा ! :अमरेंद्र कुमार राय

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को Z + ( जेड प्लस ) श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। भारत में नागरिकों को मिलने वाली सुरक्षा का यह दूसरा सबसे बड़ा स्तर है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ( एसआईआर ) और विरोध प्रदर्शनों के बाद उनकी सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाया गया है। उनके दिल्ली स्थित आवास, चुनाव आयोग मुख्यालय ( निर्वाचन सदन ) और पर्सनल सिक्योरिटी के घेरे में अतिरिक्त जवानों को तैनात किया गया है। आप इससे भी समझ सकते हैं कि ज्ञानेश कुमार की जान को कितना ब़ड़ा खतरा है। इस समय तीन चुनाव आयुक्त हैं। एक मुख्य चुनाव आयुक्त जो खुद ज्ञानेश कुमार हैं और दो चुनाव आयुक्त । इन तीनों के पास समान अधिकार हैं। न किसी के पास कम न किसी के पास ज्यादा। लेकिन बाकी दोनों आयुक्तों को तो इस तरह की सुरक्षा प्रदान नहीं की गई है। आखिर ज्ञानेश कुमार ने ऐसा क्या किया है जिसके चलते उनकी जान को बाकी दोनों आयुक्तों से ज्यादा खतरा है।

इसी मोदी सरकार ने 21 अगस्त 2024 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ( एनसीपी-एसपी ) के नेता शरद पवार को जेड प्लस श्रेणी की वीआईपी सुरक्षा प्रदान की थी। केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ( सीआरपीएफ ) के 55 सशस्त्र जवानों की टीम उनकी सुरक्षा में तैनात की गई। यह फैसला केंद्र सरकार ने सुरक्षा एजेंसियों द्वारा समीक्षा रिपोर्ट के आधार पर लिया था। तब शरद पवार ने सरकार के सुरक्षा संबंधी इस फैसले पर हैरानी जताई थी। उन्होंने पूछा था कि उन्हें किस तरह का खतरा है जो सरकार इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था कर रही है। अभी तक यह सुरक्षा व्यवस्था चंद गिने चुने लोगों जिनमें खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के पास ही है। शरद पवार ने अपने आवास के भीतर अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, गाड़ी बदलने और गाड़ी के अंदर दो सुरक्षा कर्मियों के साथ बैठने जैसे कुछ सुरक्षा प्रस्तावों को खारिज कर दिया था। उन दिनों देश में आम चुनावों का माहौल था। तब शरद पवार ने कहा था कि यह उनके बारे में जानकारी जुटाने का एक तरीका हो सकता है।

मैंने एक संस्थान में काम किया। वह संस्थान देश के कुछ प्रभावशाली लोगों को अपने साथ जोड़ता था और उन्हें एक लाख रुपये प्रति माह और गाड़ी ( ड्राइवर समेत ) मुहैया कराता था। ड्राइवर को निर्देश था कि वह जहां जहां जाए उसकी इंट्री एक कॉपी ( लॉग बुक ) में करे। ताकि पता चल सके कि जितना तेल गाड़ी में पड़ रहा है ? वह उचित है कि नहीं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि ड्राइवर गाड़ी कम चला रहा हो और तेल ज्यादा डलवा रहा है ? देखने में यह अति साधारण बात लगती है लेकिन आप सोचें तो आपको पता चलेगा कि सिर्फ इतने से काम से उस वीआईपी की सारी गतिविधियों की जानकारी संस्थान को मिल जाती थी कि वह वीआईपी किन-किन लोगों से मिलने गया। क्या पता यह भी पता चलता हो कि वहां उस वीआईपी से मिलने कौन-कौन लोग आते थे। तो यह उस वीआईपी को संस्थान द्वारा प्रदान की गई सुविधा नहीं बल्कि उसकी जासूसी थी। शरद पवार ने ठीक ही कहा कि सुरक्षा के नाम पर उनके बारे में पूरी जानकारी जुटाने का यह एक जरिया हो सकता है।

वीआईपी लोगों, जिन्हें इस स्तर की सुरक्षा मिलती है उन्हें बाहर का कोई आदमी शायद ही मार पाये। लेकिन हत्या तो वीआईपी की भी होती ही है। अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी मारे गये। खुद अपने देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मारी गईं। न्यायाधीशों को भी ज्यादा नहीं तो थोड़ी बहुत सुरक्षा तो मिलती ही है फिर भी उनकी मृत्यु हुई। न्यायाधीश लोया का उदाहरण हमारे सामने है। तो सुरक्षा पाए ऐसे लोग मारे तो जाते हैं लेकिन वे बाहरी हमलों से कम भीतरी हमलों और षड़यंत्रों से ज्यादा। तो ज्ञानेश कुमार की स्थिति भी ऐसी ही कुछ दिख रही है।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी पिछले करीब साल भर से ठोस सबूतों के साथ ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगा रहे हैं कि वे वोट चोरी करा रहे हैं। साल भर पहले बंगलौर के प्रजेंटेशन में उन्होंने यह बात साबित की थी कि कंप्यूटर के जरिये बड़े पैमाने पर वोट जोड़े और हटाये जा रहे हैं और यह काम बिना चुनाव आयोग की मिलीभगत के नहीं हो सकता। अभी हाल ही में चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने आरोप लगाया है कि वोट जोड़ने और हटाने का जो अधिकार ईआरओ ( स्थानीय प्रशासन, एसडीएम ) के पास था उसे खत्म कर दिया गया है। और उसका केंद्रीकरण कर दिया गया है। आई टी की कोई अधिकारी सीमा खन्ना के हाथ में वे सारे अधिकार चले गये हैं। वो जिनका नाम चाहती हैं जोड़ती हैं और जिनका नाम चाहती हैं, हटाती हैं। यहां तक कि गोवा के अधिकारी कहते रह गये 97 लोगों के नाम मतदाता सूची में नहीं जुड़े। चुनाव आयुक्तों ने जो आरोप लगाये उनमें यह भी शामिल था कि ज्ञानेश कुमार चुनाव के नाम पर खुद मनमाने ढंग से फैसले लेते हैं और कुछ अधिकारियों की मदद से उन्हें लागू कराते हैं। उन लोगों को मीडिया से पता चलता है कि चुनाव आयोग ने अमुक-अमुक फैसले लिये हैं।

इसका मतलब है कि अगर सचमुच वोट चोरी हो रहा है तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार वह केंद्रीय कड़ी हैं जिन्हें सब कुछ पता है कि वोट चोरी कब-कब, किन-किन चुनावों में और कैसे-कैसे की गई है। सोमवार को राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से लौटने के बाद एक संवाददाता सम्मेलन किया। जिसमें एक पत्रकार ने पूछा कि क्या आपको ज्ञानेश कुमार ने कभी संपर्क करने की कोशिश की ? उसके जवाब में राहुल गांधी ने हां कहा। यह भी कहा कि मैंने उन्हें कहा है कि वे आयें और सरकारी गवाह बन जाएं। राहुल गांधी ने ये पेशकश पहले भी ज्ञानेश कुमार से की थी। इससे इतना तो साफ साफ पता चलता है कि राहुल गांधी को भी पता है कि वोट चोरी में ज्ञानेश कुमार की मुख्य भूमिका है। लेकिन शायद उनके पास अपनी बात को साबित करने के लिए पुख्ता सबूत नहीं हैं। इसीलिए वे चाहते हैं कि ज्ञानेश कुमार खुद अपनी गलती स्वीकार करें और सरकारी गवाह बनकर सबूतों के बारे में जानकारी दें।

ज्ञानेश कुमार खुद चुनाव नहीं लड़ते। उनकी कोई राजनीतिक पार्टी भी नहीं है। जाहिर है अगर वो वोट चोरी कर-करा रहे हैं तो किसी दूसरी पार्टी के लिए। अभी तक ऐसा लग रहा है कि उन्होंने जो कुछ भी किया, कराया उसका लाभ सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और उसके शीर्ष नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को मिला है। राहुल गांधी ये भी चाहते हैं कि वो सरकारी गवाह बनें और बतायें कि किसके कहने पर उन्होंने वोट चोरी की ?

ज्ञानेश कुमार के लिए खतरे की असली वजह यही हो सकती है। आपने सत्तर और अस्सी के दशक की कई फिल्में देखी होंगीं। जिसमें खलनायक कहता है कि इस धंधे में आने का रास्ता तो खुला है, जाने का दरवाजा बंद होता है। और अगर कोई जाने की सोचता है या कोशिश करता है तो उसका अंत बड़ा भयानक होता है। ईश्वर ज्ञानेश कुमार की रक्षा करे। वे इस खेल में बेशक अपनी मर्जी से शामिल हुए होंगे, लेकिन अब लौटने का रास्ता जोखिम भरा है। दरअसल उनके पास जो राज है, वह उनके लिए सबसे बड़ा खतरा है।

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