बकरीलोक: मिमियाती महानता का महासमर ◆ डॉ स्वाति चौधरी

यह देश अब 'लोकतंत्र' नहीं, 'बकरीतंत्र' बन चुका है। जहाँ हर नागरिक मिमियाने में गर्व महसूस करता है, और हर नेता बकरी चराने को 'विकास यात्रा' बताता है।

यहाँ बहस नहीं होती, बस मैं-मैं' का महायुद्ध होता है।

कोई कहता है "मेरे नेता ने सड़क बनाई", दूसरा कहता है "मेरे नेता ने ट्वीट किया" और जनता; जो असल में सड़क पर ही पड़ी है, वो भी झूमकर ताली बजाती है। जय हो, बकरीलोक की!

बकरीलोक के नागरिकों की भी क्या बात करें!

सुबह अख़बार पढ़ते हैं, शाम को वही बात व्हाट्सएप पर फॉरवर्ड करते हैं, और रात को टीवी डिबेट में 'मिमियाक्ति युद्ध' लड़ते हैं।

तर्क? तथ्य? वो तो देशद्रोह है भैया! यहाँ सिर्फ़ 'भावना से पेट भरता है' और सोशल मीडिया से आत्मा तृप्त होती है।

राजनीति? वो तो अब 'चारागाह' बन गई है। हर कोई चर रहा है, कोई पद, कोई सम्मान, कोई ठेका।

...और जनता? वो तो बस घास काट रही है, ताकि पुनः पुनः बकरीराज सत्ता।

नेता क्या हैं? बकरी वाणी के विशेषज्ञ!

आज कहेंगे, "हमने यह किया", कल कहेंगे, "पिछली सरकार ने नहीं किया", पर असल में क्या किया? तो जवाब होगा, "विपक्ष में देशद्रोही हैं!" बस, मिमियाओ और आगे बढ़ो।

'बकरीलोक का न्याय भी अनोखा है।' अगर किसी ने सवाल पूछ लिया तो वो 'असभ्य बकरा' घोषित कर दिया जाता है। उसे झुंड से बाहर कर दिया जाता है। क्योंकि यहाँ सिर्फ़ "स्वीकृत मिमियाहट" को ही देशभक्ति का दर्जा प्राप्त है।

तो हे नागरिको!

अब समय आ गया है, अपनी 'अकल की सींग काटकर', मिमियाने का प्रशिक्षण लें। सोचने की ज़रूरत नहीं, बस पूछिए :

'अगली बार किस बकरी को चुनें?'

क्योंकि इस बकरीलोक में, चरना ज़रूरी है... चाहे खेत उजड़ जाएँ, या आत्मा।

जय बकरीलोक!

जय मिमियामंत्र!

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