kavita

ज़हर को और ज़हरीला बनाने में वो माहिर है...



से देखा है, झेला है, बदन पर आजमाया है वही क़ातिल है जो तफ्तीश करने घर में आया है


बहुत शातिर है वो, उस्ताद है अपने हुनर में वो, वो बनता है बड़ा अपना, हक़ीक़त में पराया है


उसे आता है बातों से लुभाना, चाहे कुछ भी हो बरस दर हर बरस, दशकों से उसने आजमाया है


ज़हर को और ज़हरीला बनाने में वो माहिर है बड़ी मासूमियत से जो फ़िज़ां में जा मिलाया है


कहाँ तक मैं करूँ तारीफ़ उसकी और क्या क्या है ज़रा घर से निकल कर देख, कैसा कुफ्र ढाया है

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