कविता : "प्रेम " एक एहसास
बख़्तावर हनीफ़
"प्रेम " एक एहसास
तुम इतनी प्रेम से भरी हो
मुझे तब पता चलता है
जब तुम अनवरत पूछती हो
कहां आ गये ,कितनी देर और लगेगी ।
तुम इतनी प्रेम से भरी हो ,
मुझे तब पता चलता है
जब पूछती हो , खाना खा लिया
खाना खाते ही नहीं सो जाना ।
तुम इतनी प्रेम से भरी हो
मुझे तब पता चलता है
जब पूछती हो ,हाथ का दर्द कैसा है
विटामिन लिया करो और साथ में कैल्शियम।
तुम इतनी प्रेम से भरी हो ,
मुझे तब पता चलता है
जब पूछती हो खाने मे क्या खाया
अच्छा खाना खाया करो फाइबर युक्त ।
तुम इतनी प्रेम से भरी हो
मुझे तब पता चलता है
जब पूछती हो टहलने तो नहीं गये
गर्मी बहुत है जाना नहीं ।
तुम इतने प्रेम से भरी हो
मुझे तब पता चलता
जब सुबह सुबह बेड पर लाती हो एक हाथ में पानी की बोतल
और दूसरे हाथ में अखबार ,
पूछती हो चाय के साथ क्या लोगे।
तुम इतनी प्रेम से भरी हो
मुझे तब पता चलता है
जब एक परांठे की जगह खिला देती हो दो परांठे
और कहती हो बहुत छोटे छोटे ही तो हैं।
तुम इतनी प्रेम से भरी हो
मुझे तब पता चलता है
जब बच्चों से छिपाकर रख देती हो
वो स्पेशल स्वदिष्ट व्यंजन मेरे लिए ।
तुम इतनी प्रेम से भरी हो
मुझे तब पता चलता है
जब मैं जाता हूं तो देखती हो
अनवरत उस राह को कि जल्दी आना
और छिपा लेती हो आंचल में आंसू।
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