प्रश्नपत्र देवता का अपहरण.....
डॉ स्वाति चौधरी
कहते हैं कि प्राचीन काल में विद्या की देवी सरस्वती के दरबार में एक अत्यंत सम्मानित देवता रहते थे, 'प्रश्नपत्र देवता'। उनका काम था, कि वह योग्य विद्यार्थियों की मेहनत की परीक्षा लें और परिश्रम को फल दिलाएँ। सदियों तक उनका सम्मान बना रहा। परंतु, कलियुग के नवीन संस्करण में उनकी दशा कुछ वैसी हो गयी जैसी किसी लोकतांत्रिक देश में सत्य की हो जाती है; सब उसका नाम लेते हैं, पर उसे खोजने कोई नहीं निकलता।
एक दिन प्रश्नपत्र देवता सहसा लापता हो गए।
परीक्षा भवनों में हड़कंप मच गया। विद्यार्थियों ने देखा कि परीक्षा शुरू होने से पहले ही कुछ लोगों के चेहरों पर वैसी चमक है जैसी किसी साधु को मोक्ष मिलने पर प्राप्त होती है। वह उत्तर ऐसे लिख रहे थे मानो रात में स्वयं ब्रह्मा जी ने उन्हें भविष्य का दर्शन करा दिया हो।
उधर मेहनती विद्यार्थी माथा पकड़कर बैठे थे। वह वर्षों से क़िताबों के जंगल में तपस्या कर रहे थे और अब उन्हें लग रहा था, कि शायद सफलता का मार्ग पुस्तकालय से नहीं, किसी रहस्यमयी सुरंग से होकर जाता है।
सरकार ने तत्काल एक उच्चस्तरीय जाँच समिति बनायी। समिति ने जाँच प्रारंभ की और निष्कर्ष निकाला, कि प्रश्नपत्र देवता का अपहरण हुआ है। इसके बाद एक विशेष जाँच दल गठित हुआ जिसने निष्कर्ष निकाला, कि अपहरण की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिर उस दल की निगरानी के लिए एक आयोग बना, आयोग की समीक्षा के लिए परिषद बनी और परिषद की निष्पक्षता की जाँच के लिए एक विशेषज्ञ समूह।
इस बीच प्रश्नपत्र देवता स्वयं एक गोपनीय स्थान पर बैठे यह सब देख रहे थे और सोच रहे थे, कि उनका अपहरण कम हुआ है, उनकी स्मृति में संस्थानों का निर्माण अधिक हो रहा है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन आरंभ हुआ। देश के कोने-कोने से विद्यार्थी पहुँचे। कोई न्याय माँग रहा था, कोई उत्तर माँग रहा था और कुछ लोग यह पूछ रहे थे, कि यदि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र बाहर आ सकता है तो परिणाम से पहले नौकरी भी बाहर आ सकती है क्या?जंतर-मंतर उस दिन किसी लोकतांत्रिक तीर्थ में बदल गया था। वहाँ नारों की गूँज थी, आशाओं का धुआँ था और कैमरों की ऐसी भीड़ थी जैसे न्याय नहीं, टीआरपी का महाकुंभ लगा हो। आंदोलनकारियों ने आकाश की ओर देखकर पुकारा, "हे प्रश्नपत्र देवता! आप कहाँ हैं?" तभी बादलों के पीछे से एक मद्धिम आवाज आयी, "मैं यहीं हूँ। किंतु, अब मुझे परीक्षा केंद्रों में नहीं, व्हाट्सऐप लोक और टेलीग्राम पुराण में खोजा जाता है।" भीड़ स्तब्ध रह गयी!!
एक विद्यार्थी ने पूछा, "देवता! फिर मेहनत का क्या होगा?"
प्रश्नपत्र देवता मुस्कुराए, "मेहनत अभी भी सबसे मूल्यवान वस्तु है। समस्या यह है, कि उसका बाज़ार भाव घट गया है और दलालों का बढ़ गया है।"
इतना सुनते ही कुछ लोग आहत हो गए, कुछ लोग सक्रिय हो गए और कुछ लोग समिति बनाने चले गए। कथा का अंत अभी नहीं हुआ है, क्योंकि इस देश में हर पेपर लीक के बाद दो चीज़ें अवश्य जन्म लेती हैं; एक नयी जाँच और एक नयी आशा। जाँच धीरे-धीरे चलती है, आशा बार-बार टूटती है, फिर भी विद्यार्थी उसे फिर से जोड़ लेते हैं।
...इसी आशा पर टिकी है 'व्यवस्था'।
और प्रश्नपत्र देवता?
वह आज भी प्रतीक्षा कर रहे हैं, कि कोई ऐसा युग आये जब परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र नहीं, विद्यार्थियों की मेहनत बाहर निकले।
"अब देश की सबसे बड़ी परीक्षा का वास्तविक विषय; जीवविज्ञान, रसायनशास्त्र और भौतिकी नहीं, 'व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखना' बन गया है! ...क्योंकि देश का भविष्य धरने पर बैठा है और जिन संस्थाओं की डिग्रियों से समाधान जन्म लेने चाहिए थे, वहाँ से वर्षों से मात्र आश्वासनों की प्रसव-पीड़ा निकल रही है।"
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