अदालती कार्रवाई में साहित्य का समावेश

◆ आलोक यात्री

कहते हैं भूख से बड़ी त्रासदी कोई दूसरी नहीं। क्या ईश्वर ने मानव को भूख की सौगात देकर इस धरती पर भेजा है। भूख और उसके वैश्विक आंकड़ों को देख कर तो ऐसा ही लगता है। दुनिया की एक बड़ी आबादी भूख से जूझ रही है। हमारे देश में भी भूखे इंसानों की तादाद कम नहीं है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार प्रति माह राशन के 80 करोड़ पैकेट बांटती है। यानी देश के लगभग साढ़े तीन अरब लोगों की जिंदगी सरकारी निवाले के भरोसे बशर हो रही है। लेकिन इस व्यवस्था में भी जब-तब सुराख हो जाता है जब भूख से किसी की मौत सुर्खी बनती है।

दो साल की बच्ची ईशा की भी भूख की वजह से जान चली गई। भूखी ईशा के खाना मांगने पर पीट-पीट कर उसकी जान ले ली गई। भूख से बिलखती बेटी की तड़प एक मां के लिए शायद इसीलिए नाकाबिले बर्दाश्त हो गई क्योंकि वह बेटी को भोजन दे पाने में असमर्थ थी। भूख की सजा महज एक बच्ची को ही नहीं मिली बल्कि उसकी मां भी सजा के दायरे में आ गई है।

चार महीने बाद हत्यारिन मां को अदालत से जमानत मिल गई है। इस मामले में एक हत्यारोपी को जमानत मिलना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितनी गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की टिप्पणी। उच्च न्यायालय की एक पीठ ने इस प्रकरण को दिल दहला देने वाली घटना बताते हुए कहा कि भूख केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है बल्कि मानवीय गरिमा, न्याय और जमीर का मामला है। अदालत ने इसे समाज और व्यवस्था की सामूहिक विफलता करार दिया है। अदालत ने कहा कि जब भूख एक मां को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर करे तो यह केवल अपराध नहीं बल्कि मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय का गंभीर विषय है। अत्यधिक गरीबी के प्रभाव को समझने के लिए अदालत ने अपने फैसले में विश्व विख्यात लेखकों पन्नालाल पटेल, चार्ल्स डिकेंस, विक्टर ह्यूगो और महात्मा गांधी के विचारों व तर्कों का हवाला दिया है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार तीन बच्चों की मां लखीबेन सोलंकी ने मार्च 2026 में बेटी ईशा द्वारा बार-बार खाना मांगने पर उसकी बेरहमी से पिटाई कर दी थी। बचाव पक्ष का कहना था कि तीन बच्चों की मां, जिसे उसका पति छोड़ चुका था, अत्यधिक गरीबी, भुखमरी और 7 महीने की गर्भावस्था से जूझ रही थी। आरोपी मां की जमानत अर्जी मंजूर करते हुए अपने फैसले में अदालत में दो विश्व विख्यात उपन्यासों, पन्नालाल पटेल के गुजराती उपन्यास 'मानवीनी भवाई' और विक्टर ह्यूगो के उपन्यास 'लेस मिसरेबल्स' का हवाला दिया है।

न्यायमूर्ति हसमुख डी. सुथार की पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि भुखमरी जब किसी मां को इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर देती है तो यह विफलता किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की होती है। अदालत में यह भी कहा कि इस दुखद घटना को करुणा और इस बात के पुख्ता संकल्प के तौर पर देखा जाना चाहिए कि कोई भी मां या बच्चा भुखमरी की पीड़ा सहने को मजबूर न हो। फैसले में उद्धृत उपन्यासों में से एक में पन्नालाल पटेल ने भीष्ण भूख और सामाजिक व्यवस्था के ढहने से पैदा होने वाले मनोवैज्ञानिक डर को रेखांकित किया है। जबकि विक्टर ह्यूगो ने 19वीं सदी के फ्रांस में गरीब, दबे कुचले और समाज के हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों की जिंदगी और संघर्ष को दर्शाया है। चार्ल्स डिकेंस ने भी 19वीं सदी के औद्योगिक ब्रिटेन में भूख, गरीबी और सामाजिक न्याय को बहुत करीब से देखा और अपनी रचनाओं में उसे गहराई से उभारा है। उनका यह कथन खास ध्यान देने योग्य है 'चमचमाते और खुशहाल लंदन के नीचे एक अंधेरा, भूखा और रोता हुआ लंदन भी बसता है।' एक जगह वह लिखते हैं 'भूख उन दीवारों को भी तोड़ देती है जिन्हें कानून नहीं लांघ सकता।'

अपने फैसले में अदालत ने महात्मा गांधी और ब्रितानी लेखक चार्ल्स डिकेंस के कथनों के अलावा हिंदू, मुस्लिम एवं ईसाई धर्म ग्रंथों का भी उल्लेख किया है। जिसमें भूखे को खाना खिलाने को एक पवित्र कर्तव्य बताया गया है। फैसले में महात्मा गांधी के इस उदाहरण को इंगित किया गया है कि दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो इतने भूखे हैं कि उन्हें भगवान रोटी के रूप में ही दिखाई दे सकते हैं। फैसले में कहा गया है कि सभी धर्म यह बताते हैं कि किसी व्यक्ति को भूख से मरने देना न केवल एक सामाजिक विफलता है, बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक विफलता भी है।

पीठ ने कहा कि यह घटना दिल दहला देने वाली होने के साथ-साथ यह भी याद दिलाती है कि भूख महज आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा, न्याय और अंतरात्मा का मामला है। अदालत ने कहा कि यह घटना केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज पर एक गंभीर आरोप है और यह सामाजिक न्याय एवं नैतिकता से जुड़े बुनियादी सवाल खड़े करती है। फैसले में पीठ ने टिप्पणी की 'इस अदालत का मानना है कि सामाजिक न्याय इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर इंसान को भोजन, रहने की जगह स्वास्थ्य सेवा और सम्मान जैसी बुनियादी जरूरतें मिलनी चाहिए। भुखमरी के कारण जब कोई मां इतना कठोर कदम उठाने पर मजबूर हो जाती है तो यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता होती है।' अदालत ने यह भी कहा कि यह घटना सामाजिक कल्याण व्यवस्था की विफलता को भी दर्शाती है और कमजोर परिवारों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए राज्य और समाज की नैतिक जिम्मेदारी को उजागर करती है। अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय संविधान के तहत बच्चों को छह साल की आयु पूरी होने तक शुरूआती बचपन की देखभाल और शिक्षा के लिए मौलिक अधिकार दिए गए हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए पोषण के स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाना राज्य सरकार का कर्तव्य है। शायद यह पहली बार है जब अदालत ने अपने फैसले के लिए साहित्य की ओर रुख किया है।

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