महानगर में एक पल्ले के दरवाजे सी जिंदगी: अलोक यात्री
महानगर के इंसान की हैसियत को आंकने, देखने का सबका अलग-अलग पैमाना हो सकता है। लेकिन लगभग दो दशक के दौरान मेरा निजी आकलन यह है कि महानगर में आदमी एक पल्ले का दरवाजा हो कर रह गया है। इस बात का अहसास लगभग...