फिल्म "चिल्लर पार्टी" देखी क्या..?


◆ आलोक यात्री

जंतर मंतर पर सब कुछ सामान्य चल रहा था

लेकिन पता नहीं किस तुफैल में किसी ने बोतल का ढक्कन खोल दिया

ढक्कन खुलते ही...

जिन बोतल से बाहर आ गया

और इन दिनों विक्रमादित्य की पीठ पर बेताल की तरह सवार होने की तर्ज पर गांव, कस्बों और नगर नगर स्कूली छात्रों के कंधे पर सवार दिखाई दे रहा है

इसे जिन की करामात ही माना जाएगा कि 8वीं, 9वीं के छात्रों को दिल्ली की हवा लग गई

एक फिल्म आई थी "चिल्लर पार्टी" शायद सलमान खान ने बनाई थी

जिसमें एक सोसायटी के बच्चे एक स्ट्रीट डॉग से सहानुभूति की वजह से एक पॉवरफुल नेता के विरोध में एकजुट हो जाते हैं

मुम्बई की सड़कों पर साइकिल रैली निकालते हैं अंडरवियर मार्च करते हैं

यहां तक कि नेता जी के सामने टीवी डिबेट में भी बैठते हैं

और अंत में... एक स्ट्रीट डॉग के पक्ष में लड़ी गई जंग जीत जाते हैं


यह फिल्म आज से लगभग 14 साल पहले आई थी

निसंदेह कस्बों से लेकर शहरों की सड़कों पर अपने स्कूल की अव्यवस्थाओं को दूर करने की आवाज उठाने वाले यह बच्चे कौन हैं?

कहीं कल की चिल्लर पार्टी ही तो नहीं...?

बरसों से गंदगी से लबालब शौचालयों का इस्तेमाल करने के आदी

सीलन भरे अंधेरे कमरों से ही तसल्ली कर लेने वाले

स्कूल मैदान में जल भराव और पंखों विहीन छतों के नीचे बैठ कर घटिया मिड डे मील खाने वाले बच्चे

अपने अधिकारों को लेकर अचानक इतने जागरूक कैसे हो गए...?

देश का एक‌ बड़ा तबका ऐसा भी है जिसके गले यह बात नहीं उतर पा रही है

वह इस प्रतिक्रिया को स्वस्फूर्त नहीं मानता

उसे इन बच्चों की स्वाभाविक मांग भी किसी और की साज़िश दिखाई दे रही है


यहां संदर्भ के तौर पर अपना एक ताज़ा अनुभव आपके साथ साझा कर रहा हूं

यह अनुभव अपना हक मांगने वालों के पक्ष में नहीं है बल्कि बच्चों के मानसिक स्तर पर उतरने की एक सहज प्रक्रिया है


मई के अंत में मुझे मित्रों के परिवार के साथ कसौली प्रवास का अवसर मिला। कुल आठ बच्चे। तीन लड़के पांच लड़कियां। इन्हें मोबाइल से दूर रखने के लिए कुछ इनडोर आयोजन भी किए गए। एक सत्र फुटबॉल वर्ल्ड कप के नाम भी रहा।

बारह, तेरह, चौदह साल के इन बच्चों (जिनमें मेरा भतीजा अभिनव भी शामिल है) को आप मेधा और समझ के तौर पर कमतर नहीं आंक सकते और न ही इनको इग्नोर कर सकते हैं।


हां तो... वर्ल्ड कप फुटबॉल खत्म हुए तीन हफ्ते हो गए। हो सकता है आपको यह नहीं पता हो कि टूर्नामेंट में कितनी टीमें और कितने खिलाड़ी खेले थे?

क्वार्टर फाइनल में कितनी टीमें पहुंची थीं?

लेकिन कसौली में बैठे इन बच्चों ने जिन दस टीमों का नाम लिया उनमें से 8 टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंची

आपमें से बहुतों को शायद आज भी यह नहीं पता होगा कि सेमीफाइनल में कौन से देश पहुंचे?

इन बच्चों के अलग अलग आकलन में 5 टीमें थीं। उनमें से 4 टीम सेमीफाइनल में पहुंची।

कसौली में डाइनिंग टेबल पर बैठे यह बच्चे दावे के साथ यह तो नहीं बता पाए कि कौन सी टीम खिताब जीतेगी।

लेकिन अपने तर्कों के आधार पर इनका आकलन जिन दो टीमों को लेकर था। वही दोनों टीमें अंततः फाइनल में भिड़ीं।

आपमें से अधिकांश शायद यह भी न बता पाएं कि कौन सी दो टीमें फाइनल में आमने-सामने थीं?

इन बच्चों को यह भी पता था कि किस टीम का कौन सा खिलाड़ी वर्ल्ड कप में पहले से कितने गोल दागे चुका है?

कौन गोल्डन बूट हासिल करने में किसके साथ स्पर्धा में है?

कौन गोल्डन बूट हासिल नहीं करेगा तो क्यों?

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि वर्ल्ड कप में कुल 48 टीम और लगभग 12 सौ से अधिक खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया।


इसके बाद... बात कार रेसिंग की...

दनादन सवाल दनादन ज़वाब

भारत में किस ऑटो मोबाइल कंपनी के कौन कौन से मॉडल सड़क पर हैं

(हमें तो मारुति के भी मॉडल्स का नहीं पता)


और फिर स्पेस की बात...

भारत ने हाल ही में कौन कौन सी मिसाइलों का परीक्षण किया

चांद पर बस्ती कौन बना रहा है

स्पेश शटल में यात्रा कौन कराने वाला है आदि... आदि...

इस संदर्भ में एक बात और जानने योग्य है

वह यह कि इस समूह में 7 साल से लेकर 15 साल के ही बच्चे थे। जिन्हें देश दुनिया के भीतर बाहर का हर सच, हर तथ्य, हर नतीजा हमसे बेहतर पता था। और हम पूछे गए सवालों का जवाब गूगल बाबा से पूछ कर जांच रहे थे

उन्हें फेल करने की हमारी बचकाना कोशिश हमें शर्मिंदा कर रही थी


अब यह भी जान लीजिए कि हम अभिभावकों में कौन कौन था?

मैं अदना सा पत्रकार...

एशिया के सबसे बड़े मीडिया ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर

हिन्दुस्तान टाइम्स के दो सीनियर्स

जी टीवी से जुड़े एक सीनियर

अमर उजाला, दैनिक जागरण सहित कई महत्वपूर्ण मीडिया संस्थानों से जुड़े दो सीनियर्स


एक सलाह दूं... जिन्होंने फिल्म चिल्लर पार्टी न देखी हो देख लें

फिर तय करें कि यह बच्चे सीलनदार अंधेरे कमरों में बैठकर पढ़ने को क्यों मजबूर हों?

लड़कियों के लिए प्रथक और स्वच्छ शौचालय क्यों न हों?

स्कूलों में बिजली पानी की सुविधा क्यों न हो?

शिक्षक अपना धर्म क्यों न निभाएं?

और मिड डे मील "जय दरिया बादशाह" क्यों हो...?

"जय दरिया बादशाह " की बात अगली पोस्ट में

(पोस्ट में प्रयुक्त चित्र कसौली प्रवास के)

Disclaimer: The views expressed in this article are the personal opinions of the author and do not necessarily reflect the views of MuktiDeep or its editorial team.