कांवड़ यात्रा: क्या केवल आस्था का विस्तार !

◆ रवि अरोड़ा

सावन का महीना है और सड़कों पर जहां तक निगाह डालो भगवा रंग ही दिखाई दे रहा है। हरिद्वार से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और बिहार तक सड़कों पर कांवड़ियों की भीड़, उनके लिए बनाए गए शिविर, भोजन-पानी की व्यवस्थाएं, धार्मिक संगीत और “बोल बम” के नारों का शोर जैसे अब पूरी तरह सावन का ही पर्याय बन चुका है। आंकड़े बता रहे हैं कि कांवड़ियों की संख्या हर साल पहले से अधिक बढ़ रही है। रविवार शाम तक यह आंकड़ा सवा तीन करोड़ तक पहुंच चुका था और अगले कुछ ही घंटों में इसके चार करोड़ को भी पार करने का अनुमान है। कहां से आ गए इतने कांवड़िए ? कौन हैं ये लोग ? इस देह तोड़ मशक्कत का प्रयोजन क्या केवल धर्म ही है अथवा कुछ और भी है ? बेशक गंगा जल लाकर शिव को अर्पित करने की धार्मिक परंपरा सदियों पुरानी है मगर पिछले कुछ दशकों में ऐसा क्या हुआ कि इतने कांवड़िए घरों से निकलने लगे कि सारी प्रशासनिक व्यवस्थाएं ही चरमरा उठीं और जन जीवन ठप हो गया ? क्या कारण है कि पिछले कुछ दशकों में इसका स्वरूप असाधारण रूप से विशाल, सार्वजनिक के साथ साथ प्रदर्शनकारी भी हो गया ? एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि यह यात्रा उत्तर भारतीयों की किस मानसिकता को प्रतिबिंबित कर रही है ?


बेशक इस यात्रा का मूल आधार धर्म ही है और लोग बाग़ इसे तपस्या मानते हुए श्रद्धा, मनोकामना और धार्मिक विश्वास के साथ यह यात्रा करते हैं। लेकिन क्या सिर्फ यही कारण है ? क्या यह कांवड़ यात्रा अब व्यक्तिगत पूजा न होकर सामूहिक पहचान का उत्सव नहीं बन गई है ? युवा वर्ग इसमें धर्म के साथ-साथ समूह, रोमांच, मित्रता, मनोरंजन और अपनी सामाजिक पहचान प्रदर्शित करने का अवसर भी नहीं ढूंढ रहा ? भगवा वस्त्र, विशाल कांवड़, डीजे, नारे और हजारों लोगों के बीच चलने का अनुभव युवा मन को क्या यह अहसास नहीं दे रहा है कि वह किसी बड़े और शक्तिशाली समुदाय का हिस्सा है ? किससे छुपा है कि आज का युवा अपने जीवन में केवल रोजगार और आय के साधन ही नहीं पहचान और सम्मान भी चाहता है। और जिन युवाओं को सामान्य जीवन में पर्याप्त सामाजिक प्रतिष्ठा या उपलब्धि नहीं मिल पाती, उनके लिए किसी बड़े धार्मिक समुदाय का हिस्सा बनना एक अलग प्रकार का आत्मविश्वास पैदा कर देता है। आज की कांवड़ यात्रा उन्हें एक ऐसी सामूहिक पहचान देती है जिसमें वे अकेले व्यक्ति नहीं, बल्कि एक खास समूह के हिस्से होते हैं।


उधर , सड़कों, परिवहन और संचार के विस्तार ने धार्मिक यात्राओं को जिस तरह से आसान बनाया है, ऐसे में धार्मिक आयोजनों के आसपास एक पूरा बाजार भी विकसित हो गया है। कांवड़, कपड़े, झंडे, भोजन, वाहन, शिविर, धार्मिक संगीत और दूसरे सामानों ने इस यात्रा को एक बड़े आर्थिक तंत्र में भी बदला है। धर्म और बाजार का यह गठजोड़ आज के कांवड़ उत्सव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन कर उभरा है। पहले टेलीविजन और फिर उसके बाद सोशल मीडिया का दौर। धार्मिक संगीत और टीवी धारावाहिकों ने धार्मिक प्रतीकों को घर-घर पहुंचाया। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने भी इस प्रक्रिया को कई गुना तेज कर दिया। अब विशाल कांवड़ केवल धार्मिक वस्तु नहीं है बल्कि वह कैमरे के लिए भी एक दृश्य है। यात्रा का वीडियो बनता है, सोशल मीडिया पर जाता है और अगले वर्ष हजारों युवाओं को प्रेरित करता है। इस तरह धार्मिक परंपरा अब स्वयं एक प्रकार का सामाजिक कंटेंट बन गई है।


सरकारों की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार करना पड़ेगा । इससे कोई इनकार नहीं है कि कांवड़ यात्रा सरकारों ने शुरू नहीं लेकिन पिछले एक दशक में प्रशासनिक सुविधाओं ने इसे विशाल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अवश्य निभाई ही है। सड़कें, सुरक्षा, चिकित्सा, पानी, सफाई, अस्थायी शिविर और यातायात व्यवस्था कर सरकारें वोटों की फसल काटने का जतन करने लगी हैं। कहना न होगा कि जब कोई सरकार किसी धार्मिक आयोजन को बड़े पैमाने पर सुविधाएं देती है तो वह केवल प्रशासनिक व्यवस्था ही नहीं कर रही होती बल्कि उस आयोजन को प्रतीकात्मक मान्यता भी प्रदान कर रही होती है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा स्वयं जाकर इन कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा करने से धर्म और राजनीति की सीमाएं कितनी स्पष्ट रह पाएंगी, इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। चलिए राजनीति करने का हक सभी दलों को है। सपा सरकार में भी तो जिला प्रशासन द्वारा इफ्तार की दावतें दी जाती थीं मगर उस आम आदमी का क्या कसूर है जिसे इस यात्रा के लिए घरों में लगभग कैद ही कर दिया गया ? आखिर क्या कारण रहा कि दस दिन पहले ही स्कूल और सड़कों को बंद कर दिया गया ? योगी जी ने ठीक कहा था कि सड़कें नमाज पढ़ने के लिए नहीं होतीं मगर योगी जी सड़कें उत्पात मचाने के लिए भी तो नहीं होतीं । जिस प्रकार हर साल कांवड़ यात्रियों की संख्या बढ़ती जा रही है , क्या उसे आने वाले सालों में प्रशासनिक अमला सम्भाल भी सकेगा ? क्या आने वाले सालों में एक आम शहरी को सावन के महीने में और अधिक परेशानियों के लिए तैयार रहना होगा ? आखिरी बात, क्या कोई संवैधानिक अधिकार उनका भी है जो कांवड़ लेने नहीं गए ?

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