पिपहरीपुर का महाउत्सव
◆ डॉ स्वाति चौधरी
पिपहरीपुर एक अद्भुत देश था। वहाँ के नागरिक जन्म से ही दो चीज़ें सीखते; तालियाँ बजाना और पिपहरी की आवाज़ पहचानना। जैसे ही कहीं से "पीं-पीं" की ध्वनि आती, लोग समझ जाते, कोई बड़ा ऐलान होने वाला है। बच्चे अपनी क़िताबें बंद कर लेते, दुकानदार तराजू रोक देते और बुद्धिजीवी अपनी बुद्धि थोड़ी देर के लिए विश्राम पर रख देते।
पिपहरीपुर में दो महान पिपहरीवादक थे। दोनों स्वदेशी थे, दोनों आत्मनिर्भर थे और दोनों के पास इतनी लंबी पिपहरी थी, कि उसकी आवाज़ अगले दशक तक सुनायी देती थी।
पहले पिपहरीवादक का नाम था विकसितानंद। उसकी पिपहरी से हर सुबह एक नया सूरज निकलता, "पिपहरीपुर विकसित हो गया!" लोग ख़ुश हो जाते, जैसे रातों-रात ग़रीबी ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया हो और बेरोज़गारी ने किसी दूसरे देश में शरण ले ली हो।
विकसितानंद ने एक बार घोषणा की थी, कि पाँच बरस में पिपहरीपुर स्वर्ग बन जाएगा। पाँच बरस बीते तो उसने पिपहरी थोड़ी और लंबी कर ली और बोला, "स्वर्ग की राह लंबी है, पर दिशा सही है।" फिर उसने तारीख़ बढ़ाकर पच्चीस साल आगे कर दी। अब सब निश्चिंत थे। इतनी दूर की तारीख़ पर कोई हिसाब नहीं माँगता। पिपहरी की ध्वनि लंबी हो, बस यही काफी था।
दूसरे पिपहरीवादक का नाम था दिग्विजयानंद। उसकी पिपहरी का स्वर कुछ अधिक रहस्यमय था। कभी वह घोषणा करता, "हमारी पताका अब हर दिशा में लहरा रही है!" ...और अगले ही दिन वही पिपहरी कुछ और ऊँची होकर कहती, "बस, कुछ दिशाएँ अभी शेष हैं।"
लोग क्षणभर ठिठकते, फिर तालियाँ बजाने लगते। उन्हें लगता, मंज़िल यक़ीनन बहुत दूर नहीं, आख़िर पिपहरी की आवाज़ वहाँ तक पहुँच ही रही थी।
दिग्विजयानंद की ख़ासियत थी, कि वह पिपहरी बजाते समय आँखें बंद कर लेता, जैसे किसी गहन समाधि में हो। लोग समझते, जिसे अपनी उपलब्धियाँ देखने के लिए आँखें खोलने की आवश्यकता न हो, उसकी उपलब्धियाँ निश्चय ही बहुत बड़ी होंगी।
एक दिन पिपहरीपुर के नागरिकों ने सोचा, आख़िर वे दिशाएँ हैं कहाँ, जिन पर विजय की पताकाएँ लहरा रही हैं? वह नक़्शे लेकर निकल पड़े। उत्तर में पहाड़ मिले, दक्षिण में समुद्र, पूर्व में जंगल और पश्चिम में रेगिस्तान। कहीं कोई लहराती हुई पताका दिखायी नहीं दी।
वह सभी लौट आए। तभी पिपहरी की आवाज़ आयी, "पताका दिखायी नहीं देती, इसका अर्थ यह नहीं, कि लहर नहीं रही!" लोगों ने राहत की साँस ली। अदृश्य उपलब्धियों का सबसे बड़ा लाभ यही होता है-उन्हें प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ती।
उधर विकसितानंद ने एक भव्य उत्सव रखा, "विकसित महोत्सव 2047"। मंच पर बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे; ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, मुस्कुराते बच्चे और उड़ती कारें। मंच के नीचे खड़े लोग अपनी टूटी सड़कों, बंद नलों और अधूरी नौकरियों को पोस्टरों से मिलाने की कोशिश कर रहे थे।
किसी ने पूछा, "यह सब कहाँ है?"
उत्तर मिला, "दिशा में है!"
दिशा एक अद्भुत चीज़ होती है, वहाँ सब कुछ होता है, बस पहुँचने की जल्दी नहीं होती।
दिग्विजयानंद भी पीछे नहीं था। उसने दिग्विजय सम्मेलन बुलाया। मंच पर कुर्सियाँ सजी थीं, पर जिनके आने की घोषणा की गयी थी, वह दिखायी नहीं दिए। आयोजकों ने समझाया, "वो सूक्ष्म रूप में उपस्थित हैं।"
लोगों ने ताली बजायीं। सूक्ष्म उपस्थिति पर कोई सवाल नहीं उठाता।
मंच से घोषणा हुई, "चारों दिशाओं में हमारी धाक है!"
भीड़ में से किसी ने पूछा, "उन्होंने माना कब?"
उत्तर आया, "उन्होंने नकारा कब?:
तालियाँ फिर बज उठीं।
पिपहरीपुर के स्कूलों में नया पाठ पढ़ाया जाने लगा, "दूर की फेंक विज्ञान।" बच्चों को सिखाया गया, कि लक्ष्य जितना दूर होगा, असफ़लता उतनी छोटी लगेगी।
एक छात्र ने पूछा, "गुरुजी, अगर हम पास की चीज़ें ठीक कर लें तो?"
गुरुजी ने उसे चुप करा दिया, "तुम अभी छोटे हो, बड़ी फेंक का आनंद नहीं समझते।"
इधर पिपहरीपुर की जनता धीरे-धीरे थकने लगी थी। रोज़ की पिपहरी अब कानों में चुभने लगी थी। उन्हें लगा, यदि शोर थोड़ा कम हो तो वह अपने घर की खटपट सुन सकें। पर पिपहरी का वॉल्यूम बढ़ता जा रहा था। हर सवाल के जवाब में पिपहरी बजती, हर शिक़ायत के ऊपर पिपहरी की धुन चढ़ा दी जाती और हर असुविधा को एक नयी घोषणा ढँक देती।
एक दिन पिपहरीपुर में अजीब घटना घटी। सुबह पिपहरी नहीं बजी।
लोग घबरा गए। उन्हें लगा, सूरज नहीं निकलेगा। वह चौक में इकट्ठा हुए। विकसितानंद और दिग्विजयानंद दोनों मंच पर आये। उनकी पिपहरियाँ ग़ायब थीं।
भीड़ में सन्नाटा था। किसी ने हिम्मत करके पूछ लिया, "पिपहरी कहाँ है?"
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। फिर धीरे से बोले, "पिपहरी तो आपके हाथ में थी।"
लोगों ने अपने हाथ देखे।
सचमुच, हर हथेली में एक छोटी पिपहरी थी। वही पिपहरी, जिसे वह बरसों से बजाते रहे थे, तालियों की शक्ल में, जयघोष की शक्ल में, बिना सोचे सिर हिलाने की आदत की शक्ल में।
उन्हें अचानक समझ आया, कि मंच पर खड़े लोग जितना नहीं बजाते थे, उससे कहीं ज़्यादा वह ख़ुद बजाते रहे थे। असली शोर उनके ही हाथों से उठता था और उसी शोर में उनकी अपनी समझ दबती रही।
भीड़ में एक बूढ़ा किसान खड़ा था। उसकी हथेलियों की दरारों में सूखा मौसम भरा था। उसने धीरे से अपनी पिपहरी ज़मीन पर रख दी, जैसे कोई अपनी बरसों की भूल उतार कर रख देता है।
उसके पास खड़ा बेरोज़गार युवक कुछ क्षण हिचकता रहा, फिर उसने भी पिपहरी छोड़ दी। यह क्रिया संक्रामक थी। एक-एक कर पिपहरियाँ गिरने लगीं।
धप…
धप…
धप…
यह आवाज़ पिपहरी की नहीं, भ्रम के टूटने की थी।
चौक में एक ऐसा सन्नाटा उतर आया, जो कानों से नहीं, भीतर से सुना जाता है। लोगों ने पहली बार महसूस किया, कि वच अब तक शोर में बहरे थे। सन्नाटे ने उनकी सुनने की शक्ति लौटा दी थी।
उन्हें दिखने लगा--
"पिपहरी कभी मंच पर नहीं थी।"
"पिपहरी हमेशा उनके हाथ में थी।"
विकसितानंद ने पसीना पोंछा। दिग्विजयानंद ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। उन्हें पहली बार लगा, कि बिना पिपहरी के बोलना कितना कठिन है।
भीड़ अब सुन नहीं रही थी।
"देख रही थी!"
किसी ने पूछा, "अब क्या होगा?"
बूढ़े किसान ने कहा, "अब काम होगा।"
उस दिन पिपहरीपुर में कोई घोषणा नहीं हुई। कोई पोस्टर नहीं लगा। कोई सूक्ष्म अतिथि नहीं आया।
पर गली के गड्ढे भरने लगे, नल में पानी आने लगा, स्कूल में शिक्षक समय पर पहुँचने लगे और दफ़्तरों में फाइलें चलने लगीं।
लोगों को समझ आया, कि पिपहरी का शोर जितना कम होता है, काम की आवाज़ उतनी साफ़ सुनायक देती है।
शाम को विकसितानंद और दिग्विजयानंद चुपचाप चौक से निकल गए। उन्होंने सोचा, कहीं और जाकर पिपहरी बजायी जाए, क्योंकि पिपहरीपुर के लोग अब धुन पहचान चुके थे।
कहते हैं, उसी दिन से पिपहरीपुर का असली विकास शुरू हुआ। किसी ने अब दूर की विजय की चिंता नहीं की, क्योंकि जब घर की चौखट मज़बूत हो जाती है, नल में पानी आने लगता है, बच्चे ठीक से पढ़ने लगते हैं और मेहनत को उसका फल मिलने लगता है, तब सम्मान माँगना नहीं पड़ता।
"सम्मान रास्ता पूछते हुए स्वयं घर तक आ जाता है।"
पिपहरीपुर में अब भी पिपहरियाँ हैं, लेकिन वह बच्चों का खिलौने बन गयी हैं। बड़े लोग अब घोषणा की भाषा नहीं, काम की भाषा समझते हैं।
और यह बात धीरे-धीरे पड़ोसी प्रदेशों तक भी पहुँची, कि पिपहरीपुर में अब शोर नहीं, श्रम होता है। तभी किसी ने मुस्कराकर कहा, "लगता है, पिपहरीपुर सचमुच कुछ सीख गया है।"
यही उनका पहला पाठ था;
"पिपहरी बजाना आसान है,
पर जीवन को सुर में लाना कठिन।"
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