“अरबन नक्सली" से “दिमागी नक्सली' तक का सफर


◆अमरेंद्र कुमार राय

15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले से भाषण दिया तो लोगों ने दो चीजें खासकर नोटिस कीं। एक कांपते हाथ और लड़खड़ाती जुबान और दूसरा दिमागी नक्सली का “ जुमला “। हां, इसे “ जुमला “ ही कहेंगे। इस बार प्रधानमंत्री ने जो भाषण दिया वह साफ-साफ दिख रहा था कि लिखा हुआ पढ़ रहे हैं और जो लिखा है, उसे ठीक से पढ़ भी नहीं पा रहे हैं। इससे पहले यह सब पता नहीं चलता था। क्योंकि वो टेलीप्रांम्पटर पर पढ़ते थे। समझ नहीं आया कि टेलीप्रांम्पटर इस बार क्यों नहीं लगाया गया या लगाया गया तो नीचे देख-देख कर क्यों प़ढ़ रहे थे।

लाल किले से संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि देश को “ दिमागी नक्सलियों “ से बचना चाहिए और ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग कर देना चाहिए। “ दिमागी नक्सली “ नया शब्द था। इससे पहले प्रधानमंत्री ने “ अरबन नक्सली “ शब्द का प्रयोग किया था। आखिर प्रधानमंत्री जब “ अरबन नक्सली “ या “ दिमागी नक्सली “ का प्रयोग करते हैं तो उनके दिमाग में क्या रहता है ? इसे जानने के लिए पहले “ नक्सली “ को समझना होगा, फिर “ अरबन नक्सली “ को और इसके बाद “ दिमागी नक्सली “ को। “ नक्सल “ शब्द “ नक्सलबाड़ी “ से जुड़ा हुआ है। यह एक स्थान है जो पश्चिम बंगाल में है। जो लोग दूर-दूर से नक्सली और नक्सलबाड़ी को जानते हैं उनके दिमाग में बस इतना है कि कुछ लोगों ने नक्सलबाड़ी में बंदूक उठाकर कुछ जमीदारों की हत्या कर दी थी। मतलब ये कि उन्होंने कानून को अपने हाथ में ले लिया था। यानी जो भी बंदूक उठा ले, वह नक्सली। लेकिन ऐसा है नही। बंदूक तो हत्यारे भी उठा लेते हैं, डकैत भी उठा लेते हैं, पार्टियों के कार्यकर्ता यहां तक कि बीजेपी और संघ के भी तो क्या वे सब नक्सली हैं ? नहीं। इस बात का रहस्य नक्सलबाड़ी की घटना में छिपा है। नक्सलबाड़ी में यूं ही लोगों ने बंदूक नहीं उठा ली थी। उसके पीछे एक विचार था। मतलब एक खास विचार के तहत जो बंदूक उठाता है, वह नक्सली है।

क्या हुआ था नक्सलबाड़ी में ? इसे लेखक सुशोभित ने अपनी फेसबुक वाल पर बताया है। उनके अनुसार नक्सलबाड़ी, पश्चिम बंगाल का एक गांव है, जहां 1967 में दहकानों ने बगावत की थी। अटूट शोषण के खिलाफ विद्रोह का परचम उठाया था। मई का महीना था और बिगुल किसान अपने हक की जमीन पर कब्जा लेने गया था। जमीदार के गुंडों ने उसे पीटा और उसके हल बैल छीन लिये। बरसों से अन्याय झेल रहे किसानों का धैर्य जवाब दे गया। वे बागी हो गये। जमीदारों से जमीनें छीनी जाने लगीं। देखते ही देखते आंदोलन हिंसक हो गया। खून बहने लगा। खून इसलिए नहीं बहा कि धरती के बेटे खून के प्यासे थे। वो इसलिए बहा कि बहते पसीने की उस समय कद्र नहीं की गई। नक्सलबाड़ी के नाम पर ये बागी नक्सली कहलाने लगे और उनकी विचारधारा नक्सलवाद कहलाई। इस तरह जिन्होंने अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए बंदूक उठा ली उन्हें नक्सली कहा गया। बाद में इनके लिए एक नया शब्द ढूंढ़ा गया। अरबन नक्सली। इन्हें इस रूप में पहचान दी गई जिन्होंने बंदूक तो नहीं उठाई लेकिन जो विचारों से नक्सलियों के समर्थक थे, शहरों में रहते थे और नक्सलियों की विभिन्न तरह से मदद करते थे। इसी सोच के तहत बहुत सारे बुद्धिजीवियों, अध्यापकों, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों को जेल के सीखचों के पीछे डाला गया। दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साईंबाबा और भीमा कोरेगांव एल्गार परिषद मामले में 2018 से 2020 के बीच कुल 16 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों, कवियों और बुद्धिजीवियों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें बरबर राव, सुधा भारद्वाज, फादर स्टेन स्वामी, आनंद तेलतुंबडे, गौतम नवलखा, रोना विल्सन, वरनन गोंजाल्वेस, अरूण फरेरा, सुरेंद्र गाडलिग, सोमा सेन, सुधीर ढवले, महेश राज और हनी बाबू आदि शामिल हैं। ये सभी अपने अपने क्षेत्रों में काम करने वाले विशिष्ट लोग हैं। अब जब इससे भी आगे बढ़कर नक्सलियों के लिए एक नया शब्द दिमागी नक्सली ढूंढ़ा गया है तो मैं जो समझ पा रहा हूं इसका सीधा मतलब है कि जिसके दिमाग में भी अन्याय के विरोध की बात चल रही है, वह चाहे कहीं भी रहता हो, वह दिमागी नक्सली की श्रेणी में आता है। अरबन नक्सली शब्द सिर्फ शहर में रहने वाले नक्सली सोच वालों तक सीमित था लेकिन दिमागी नक्सली का दायरा बहुत बड़ा हो गया है। अगर किसी के दिमाग में अन्याय का विरोध करने की बात चल रही हो और उसे कहीं से राहत नहीं मिल पा रही है, न्यायपालिका से भी, तो वह चाहे कहीं भी रहता हो, यहां तक कि बीजेपी में, संघ में, सरकार में, प्रधानमंत्री कार्यालय में तो भी वो दिमागी नक्सली है। उसी की पहचान करने और उसे अलग थलग करने की बात प्रधानमंत्री ने लाल किले से की है। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री ने इशारों-इशारों में कहा है कि जो भी उनके खिलाफ सोचेगा उसके साथ दिमागी नक्सलियों के नाम पर बर्बर सलूक किया जाएगा।

प्रधानमंत्री ने ऐसा क्यों कहा ? क्या प्रधानमंत्री की कुर्सी या सरकार को खतरा बढ़ता जा रहा है ? जेन जी ने आंदोलन करके शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लिया है। गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे का दबाव बढ़ा दिया है और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी को खतरे में डाल दिया है। तो क्या दिमागी नक्सली में वो भी आयेंगे ? कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने कहा है कि उन्हें दिमागी नक्सली होने पर गर्व है। प्रधानमंत्री के बोले गये शब्दों और उसकी व्यापकता को देखते हुए इसके विरोध की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ गई है। जिस तरह से नवयुवकों को कॉकरोच कहने पर कॉकरोच जनता पार्टी बन गई, उसी तरह दिमागी नक्सली कहे जाने पर एक नई पार्टी बनने की बुनियाद तैयार हो गई है। इसीलिए सरकार की ओर से सफाई दी जा रही है कि दिमागी नक्सली उन लोगों को कहा गया है जो माओवादियों के समर्थक हैं, भारतीय संविधान को नहीं मानते और जो अनुच्छेद 370 का समर्थन करने वाले हैं। और यह सफाई किसी और ने नहीं खुद मोदी के करीबी मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर दी है।

लगता है जेन जी के आंदोलन के बाद सरकार और मोदी जी बेहद घबड़ाये हुए हैं। पूरे उन्नीस दिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री संसद के सदन में नहीं आये। वे दमन का दायरा और विस्तृत करना चाहते हैं। दिमागी नक्सलियों के नाम पर अपने सभी विरोधियों को निपटा देना चाहते हैं या उनमें भय भर देना चाहते हैं। पर क्या ये इतना आसान है ? पिछले 12 सालों में मोदी – शाह ने यही किया है। सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स का भय दिखाकर लोगों को डराया, धमकाया। विपक्षी नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। बुद्धिजीवियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराकर डराया। मीडिया को गोदी मीडिया बना दिया। योगी जी ने तो एक कदम और आगे बढ़कर लोगों के घर भी गिरा दिये, बुलडोजर संस्कृति मशहूर कर दी। लेकिन जेन जी ने एक झटके में पिछले 12 सालों की स्थिति पर पानी फेर दिया। उसने सबसे बड़ा काम यही किया कि लोगों के मन से पुलिस, प्रशासन और सरकार का खौफ हटा दिया। तो 12 सालों का जो खौफ अचानक से हट गया है क्या उसे फिर से कायम करने के लिए और ज्यादा दमन किया जाएगा ? फिर अब तो विरोधियों का दायरा भी बहुत बड़ा कर दिया गया है। नक्सली, अरबन नक्सली से बढ़ाकर उसे दिमागी नक्सली तक पहुंचा दिया गया है। देश में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जिसके दिमाग में अन्याय होने और उससे मुक्ति पाने की बात न हो।

राहुल गांधी ने हाल के दिनों में कहा कि उन्हें सूचनाएं पीएमओ तक से मिल रही हैं। मतलब दिमागी नक्सलियों का दायरा आम आदमी से लेकर पीएमओ तक पहुंचा हुआ है। पिछला लोकसभा का चुनाव संविधान के मुद्दे पर लड़ा गया था। राहुल गांधी और पूरे विपक्ष ने अभियान चलाया कि मोदी, बीजेपी और संघ संविधान को नहीं मानते। रिजिजू ने अपनी सफाई में कहा है कि जो संविधान को नहीं मानते, वे दिमागी नक्सली हैं। तो क्या मोदी, बीजेपी और संघ भी दिमागी नक्सली हैं ?

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