व्यंग्य संसार: जादुई गलियारा

◆ डॉ स्वाति चौधरी

राजनीति ने फिर एक नया अध्याय खोला; सशक्तिकरण, समानता, प्रतिनिधित्व। किंतु, इन शब्दों के बीच जो छोटी-सी पंक्ति चमक रही, "शर्तें लागू" ...यही मुझे एक अजीब-सी खींच के साथ संसद की ओर ले गयी। न जाने क्यों लगा, इस बार क़ाग़ज़ पर लिखी इबारतों को आँखों से पढ़ना पर्याप्त नहीं, उन्हें दीवारों से टकराकर सुनना होगा।

मैं संसद भवन के विशाल द्वार पर पहुँची, तो क्या पाया! पाया संसद भवन का भवन अब ईंट-पत्थर-सीमेंट वाला साधारण भवन नहीं रहा, वह एक जीवित प्राणी में बदल चुका है। उसकी दीवारें साँसें ले रही थीं, गलियारे फुसफुसा रहे थे और दरवाज़े ऐसे खुल-बंद हो रहे थे जैसे किसी पुराने जादूगर की पलकें। भीतर क़दम रखते ही एक अजीब-सी गंध आयी; नयी स्याही, पुरानी फ़ाइलों और अधूरे वादों की मिली-जुली गंध। ख़ैर...


पहले कक्ष में मैंने कुर्सियों को देखा; वह स्थिर नहीं थीं। वह अपने-आप खिसक रही थीं; दाएँ से बाएँ, बाएँ से दाएँ, आड़ा-तिरछा-गोल, कुछ ढाई चाल लिए भी ...जैसे अपने नए मालिकों के हिसाब से ख़ुद को ढाल रही हों। एक कुर्सी ने मुझे देखकर मुस्कुराकर कहा, "डरो मत, यहाँ बैठने वाला कोई भी हो, हम उसे धीरे-धीरे अपने जैसा बना लेते हैं।" उसकी आवाज़ में अनुभव का भार था और व्यंग्य की हल्की मुस्कान।


आगे बढ़ी तो एक दर्पणों का गलियारा मिला। हर दर्पण में अलग-अलग चेहरे थे। कहीं सशक्त महिला नेता, कहीं संघर्षशील जनप्रतिनिधि, कहीं आदर्शों की प्रतिमूर्ति। मैं ठिठकी, तभी एक दर्पण ने झुककर कान में कहा, "इनमें से अधिकांश प्रतिबिंब हैं, वास्तविकता पीछे खड़ी है: अदृश्य!" मैंने पीछे मुड़कर देखा, वहाँ केवल परछाइयाँ थीं: धुँधली, अस्पष्ट। किंतु, नियंत्रण में...।


संसद के मध्य कक्ष में पहुँचते ही शब्दों का मेला लगा था। 'समानता' एक सुनहरी पोशाक पहनकर मंच पर नृत्य कर रही थी, 'सशक्तिकरण' उसके पीछे-पीछे चल रहा था और 'प्रतिनिधित्व' ताली बजाने में मग्न था। वहीं कोने में बैठा एक छोटा-सा शब्द, 'शर्त' मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। मैंने उससे पूछा, "तुम इतने शांत क्यों हो?"

वह बोला, "क्योंकि अंत में सब मेरे पास ही आते हैं।"


इतने में फर्श हिलने लगा। मैंने नीचे झाँका तो पाया, वह काँच का बना है और उसके नीचे पूरा देश दिख रहा है। रसोई में जलता चूल्हा, बाज़ार में मोल-भाव करता आदमी, स्कूल की फीस भरती माँ और बीच में खड़ा वह 'मध्यवर्ग', जो हर बार संतुलन साधता है, हर बार थोड़ा और झुक जाता है, थोड़ा और दब जाता है, थोड़ा और धँस जाता है, थोड़ा और बौना हो जाता है यानी बार-बार/हर बार/कई बार थोड़ा और निचुड़ता/सिमटता जाता है।


मैं देख ही रही थी, कि सहसा नीचे से आवाज़ आयी, "ऊपर क्या बदल रहा है?"

मैंने उत्तर देना चाहा, शब्द गले में अटक गए!


तभी एक क़ाग़ज़ हवा में फड़फड़ाया/उड़ा। उस पर लिखा था, "यह ऐतिहासिक परिवर्तन है।" मैंने उसे पकड़ने की कोशिश की, वह फिसल गया। फिर, फिर, फिर जितनी भी बार कोशिश हुयी, वह हर बार हाथ से फिसल जाता। इतने में पीछे से एक धीमी हँसी सुनायी दी, "इतिहास हमेशा पकड़ में नहीं आता, उसे बस घोषित किया जाता है।"


मैं थककर एक सीढ़ी पर बैठ गयी। तभी संसद की दीवारें मेरे चारों ओर सिमटने लगीं, जैसे कोई रहस्य साझा करना चाहती हों। उन्होंने धीमे स्वर से कहा, "यहाँ सब कुछ बदलता है; नाम, चेहरे, नारे। किंतु, जो नहीं बदलता, वही सबसे स्थायी है।"


मैं बाहर निकलने लगी तो द्वार ने आख़िरी बार मुझसे पूछा, "क्या देखा?"

मैंने कहा, "एक सुंदर कथा, जिसमें पात्र नए हैं, कथानक पुराना।"


द्वार मुस्कुराया, "तो तुमने सही देखा। यहाँ हर परिवर्तन एक फैंटेसी है, जिसे यथार्थ बनने में समय नहीं, साहस चाहिए… और 'साहस' यहाँ सबसे दुर्बल .. न न न ...दुर्लभ वस्तु है।"


मैं लौट आयी। मेरे भीतर संसद अब भी जीवित है; एक जादुई, विडंबनापूर्ण संसार की तरह, जहाँ हर सच्चाई को पहले सजाया जाता है, फिर बताया जाता है… और अंत में धीरे-धीरे तीन टाँग वाले कुत्ते की तरह भुला दिया जाता है!

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