भूखे वंदे मातरम् न होत गोपाला : रवि अरोड़ा
◆रवि अरोड़ा
अजब तमाशा है। जनता जनार्दन महंगाई के बोझ तले मरी जा रही है और सरकार वंदे मातरम् का राग अलाप रही है। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल भी कहां महंगाई को विमर्श के केंद्र में लाने देना चाहते हैं । वे तो जैसे छात्रों के मुद्दे पर से टस से मस नहीं हो रहे । चीनी के दामों में आग क्यों लग रही है, कोई नहीं बता रहा । एथनॉल पॉलिसी के प्रभाव का जिक्र करो तो सरकार ही नहीं भक्त मंडली को भी मिर्च लग जाती है । नोटबन्दी की तरह इस बेवकूफी भरे फैसले को भी सही ठहराने के तमाम टोटके अपनाए जाने लगते हैं। बेशक छात्रों का मुद्दा गंभीर है और देशभक्ति पर बहस भी बुरी बात नहीं है। इससे किसे इनकार है कि ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब रसोई का बजट बिगड़ रहा हो, पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम आसमान छू रहे हों, त्यौहारों का सीजन सिर पर हो और चीनी के दाम रॉकेट सरीखे ऊपर जा रहे हों , सब्जियों और खाद्य पदार्थों के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हों और परिवार अपनी आय में घर चलाने के लिए लगातार कटौती कर रहे हों, तब सरकार और राजनीतिक दलों की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?
बाजार में खाने पीने की चीजों के दाम कल कुछ और थे और आज कुछ और । आने वाले कल में शायद और बढ़ेंगे, यह दुकानदार कहते हैं मगर पता नहीं सरकार क्यों इस बेक़ाबू हालात से मुंह चुरा रही है। सरकारी आंकड़ा तो अभी भी वहीं है जो पहले था । जुलाई 2026 में भारत की खुदरा महंगाई दर 4.45 प्रतिशत रही, जो जून के 4.38 प्रतिशत से अधिक है। अगस्त में भी शायद इसी में आसपास बताया जाएगा । मगर क्या यह आंकड़े जमीनी हकीकत से मेल खाते हैं ? यदि हां तो क्यों हर घर की रसोई भारी दबाव में दिखाई दे रहा है ? समझ से परे है कि क्यों सरकार कीमतों पर लगाम कसने की बजाय आंकड़ों के मायाजाल में जनता को उलझा रही है ? उसके 4.45 प्रतिशत सीपीआई का मतलब तो यही हुआ कि हर परिवार का खर्च केवल 4.45 प्रतिशत बढ़ा है। मगर यह आंकड़ा क्या उन पर भी फिट बैठता है जिनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन, ईंधन, किराया, परिवहन और शिक्षा पर खर्च होता है ? किससे छुपा है कि भारत में आम परिवारों के बजट में भोजन की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक है, क्या सरकार यह साहस दिखाएगी कि इसके अनुरूप महंगाई दर को स्वीकार करे ? क्या सरकार नहीं जानती कि जनता अर्थशास्त्र की किताब नहीं पढ़ती, वह तो राशन व सब्जी वाले की दुकान, पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी पर कीमत देखती है।
अब रहा सवाल प्राथमिकता और राजनीतिक विमर्श का और यहीं छात्र आंदोलन और ‘वंदे मातरम्’ का विवाद सामने आता है। सरकार की यह मंशा है कि देश सब कुछ छोड़ छाड़ कर ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जबरन शुरू की तीखी बहस में शामिल हो जाए । कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने भी पीड़ित युवा की रिपोर्ट दर्ज करवाने हेतु थाने जाकर जैसे ऐलान कर दिया कि वे इस मुद्दे का दामन आसानी से नहीं छोड़ने वाले । अब ऐसे में क्या यह पूछना अनुचित होगा कि संसद, सरकार और राजनीतिक दलों का समय किस मुद्दे पर अधिक खर्च होना चाहिए ? बेशक ‘वंदे मातरम्’ भी निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या यह देश के करोड़ों परिवारों की तत्काल समस्या हैं ? क्या आम आदमी की चिंताओं की सूची में सबसे ऊपर यह नहीं है कि महीने का राशन और कितना महंगा होगा, गैस सिलेंडर कितने में आएगा, पेट्रोल भरवाने पर कितना खर्च होगा और बच्चों की फीस देने के बाद जेब में कुछ बचेगा भी अथवा नहीं ? बेशक राष्ट्रवाद जनता को गौरवान्वित कर सकता है, लेकिन रसोई का खाली डिब्बा क्या राष्ट्रवाद के नारों से भरेगा ? सरकार का काम क्या केवल आर्थिक आंकड़ों को नियंत्रित रखना है ? क्या नागरिकों को यह भरोसा देना भी उसकी प्राथमिकताओं में शुमार नहीं होना चाहिए कि उनकी आय और जीवन-यापन की लागत के बीच संतुलन बना रहेगा। क्या सरकार नहीं जानती कि यदि महंगाई लगातार बढ़ती है तो वास्तविक आय घटती है और यही अंततः जीवन स्तर को प्रभावित करती है। क्या सरकार से यह अपेक्षा नहीं होनी चाहिए कि वह राजनीतिक प्रतीकों पर बहस जरूर करे, लेकिन उन्हें जनता की आर्थिक परेशानियों पर पर्दा डालने का माध्यम न बनने दे। संसद में ‘वंदे मातरम्’ पर बहस हो सकती है, देश भर में इसपर तूफान भी उठाया जा सकता है लेकिन उसके साथ उतनी ही ऊर्जा महंगाई, रोजगार, वेतन, खाद्य सुरक्षा, घरेलू गैस, पेट्रोल-डीजल और आम आदमी की क्रय शक्ति पर भी तो लगनी चाहिए। देशभक्ति जरूरी है, लेकिन पेट भी जरूरी है। ‘वंदे मातरम्’ सुनकर देश के लिए गर्व पैदा हो सकता है मगर क्या नागरिकों को केवल गौरवान्वित करके सरकार का कर्तव्य पूरा हो जाता है ? क्या यह सुनिश्चित करना भी उसका काम नहीं कि नागरिक को महीने के अंत में यह न सोचना पड़े कि रसोई चलाऊं या बिजली का बिल भरूं ? भूखे पेट भजन कैसे होगा जी ।
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