व्यंग्य संसार: चिंटू के नक़्शे पर खोया सफ़र
◆ डॉ स्वाति चौधरी
कहते हैं, कि यात्रा आत्मा को शुद्ध करती है। किंतु, मित्र मंडली की आत्मा तो उस दिन से ही थर-थर काँप रही है जब उन्होंने "घूमने चलें उत्तराखंड" का प्रस्ताव स्वीकार किया था। ऐसा नहीं था कि उन्होंने पहली बार यात्रा की हो, लेकिन इस बार की यात्रा ऐसी थी, जैसे; रावण ने लंका छोड़ने का फ़ैसला किया हो – ढेरों प्लानिंग, हज़ारों वादे और अंत में एक महाविनाश!
चार परम मित्र – नंदू (अर्थात् इस कथा का वाचक और आपके सामने प्रस्तुत पीड़ित), चिंटू (जो हर चीज़ का एक्सपर्ट है, सिवाय असली ज्ञान के), बबलू (जिसकी आवाज़ ट्रेन के इंजन से भी ऊँची है), और पप्पू (जिसे अब तक नहीं पता, कि वो घूमने क्यों जा रहा है?) – उत्तराखंड की यात्रा पर निकलने वाले थे।
चिंटू ने कहा, "भाई सब प्लान मैंने कर लिया है – ट्रेन टिकट बुक, होटल बुक, और खाना मैं ख़ुद बनाऊँगा!"
यह सुनकर नंदू समेत समस्त मित्र-मंडली को तभी समझ जाना चाहिए था, कि यह यात्रा आध्यात्मिक नहीं, आत्महत्या के समकक्ष है।
हमारी ट्रेन "स्लीपर में नींद मत ढूँढ़ो एक्सप्रेस" रात 11 बजे की थी। प्लेटफॉर्म पर पहुँचते ही समझ आने लगा, कि ट्रेन का नाम ऐसा क्यों है? हमारी बर्थ के आस-पास चार बच्चे चीख़-पुकार मचा रहे थे, दो अंकल ताश खेल रहे थे और एक आंटी अपने पंखे से इतनी हवा कर रही थीं, कि पास वाले सहयात्री को दस्त लग गए।
बबलू ने कहा, "मैं ऊपर की बर्थ लूँगा, मुझे नींद में कोई डिस्टर्ब न करे।"
अगले दो घंटे तक बबलू नीचे गिरने से बचता रहा, क्योंकि ट्रेन की गति साँप की चाल जैसी थी - अचानक रुकती और फिर उछलती। चिंटू ने सबको "घर का बना दही-चावल" खिलाया, जो ट्रेन में ऐसा लगा मानो किसी ने दही में ट्रेन का इंजन डाल दिया हो।
उत्तराखंड पहुँचते ही वातावरण पावन हो गया और शरीर भयानक! सबने होटल ढूँढ़ा, जो बाहर से तो रिज़ॉर्ट जैसा दिखता था, लेकिन अंदर से किसी हॉन्टेड हॉस्पिटल जैसा। बबलू बोला, "कमरा सिर्फ़ 500 रुपए में मिला है!"
स्वाभाविक है - कमरे में पंखा नहीं, खिड़की नहीं और जो कुछ था वो शायद 1972 की बाढ़ से बच गया था।
अगले दिन ट्रैकिंग का प्लान था। ट्रैकिंग मतलब - पहाड़ चढ़ो, साँस फूलाओ और फिर भगवान से प्रार्थना करो, कि कहीं अगला क़दम आख़िरी न हो।
पप्पू पहले चढ़ते हुए बोला, "क्या मस्त हवा है यार!"
15 मिनट बाद – "क्या मस्त धूप है यार!"
आधे घंटे बाद – "भाई, वापस चलें क्या?"
चिंटू, जो अपने-आपको बेयर ग्रिल्स समझता था, रास्ता दिखाने चला था, लेकिन तीन बार उसी पत्थर के पास से सबको घुमाकर वापस उसी पेड़ पर ले आया। अंत में एक बकरी को फॉलो करते-करते सब रास्ते पर आए।
ट्रैकिंग के बाद भूख़ ने सबको शेर बना दिया। होटल के पास एक छोटा-सा ढाबा था। मेन्यू में लिखा था - "राजमा चावल, आलू का पराठा और गरमा-गरम चाय।"
राजमा ऐसा था, जैसे; भूले-बिसरे समाज से निकाला गया हो - आधा उबला, आधा विचार में डूबा। चावल की हालत देखकर लगा, कि वह स्वयं यात्रा करके थक गया है। पराठा भी ऐसा, कि मानो लोहे की चादर को बेलकर तवे पर रखा गया हो। चाय में दूध की जगह शक था - पीने के बाद सबने एक-दूसरे को ऐसे देखा जैसे किसी ने धोखा दे दिया हो।
स्थानीय गाइड उन्हें एक "गुप्त जलप्रपात" पर ले गया। इतना गुप्त था, कि ख़ुद को खोना पड़ा उसे ढूँढ़ने में। रास्ते में चिंटू ने कहा, "यह जलप्रपात शुद्ध करता है।"
उन्हें तब समझ नहीं आया, कि वो उनकी बुद्धि की बात कर रहा था या उनके जूतों की, जो कीचड़ में समा चुके थे।
जलप्रपात पहुँचे, सबने फोटो खिंचवाए, किंतु; सिर्फ़ पप्पू की फोटो सही आयी, वह पूरे समय पत्थर पर जो सो रहा था।
वापसी में ट्रेन छूट गयी, कारण; बबलू ने अंतिम दिन "लोकेशन शूट" करने की ज़िद्द पकड़ ली थी। सबको लोकल बस में बैठकर आठ घंटे की यात्रा करनी पड़ी, जिसमें पप्पू उल्टी करता रहा, चिंटू रास्ते में गाइड बनने की कोशिश करता रहा और नंदू... नंदू बस प्रार्थना करता रहा, कि अगली बार घर से बाहर क़दम न रखना पड़े।
नंदू ने इस पूरी यात्रा में क्या-क्या पाया? आइए जानते हैं:-
• धैर्य; क्योंकि ट्रैफ़िक ...सॉरी, सॉरी ट्रैजिक और चिंटू दोनों को सहन करना एक तपस्या से कम न था।
• अनुभव; क्योंकि अब वह जानता हैं, कि सस्ता होटल और बासी राजमा साथ-साथ आते हैं।
• मित्रता; क्योंकि अगर आप किसी को पूरी यात्रा के बाद भी मारना न चाहें, तो वह 'सच्चा मित्र' है।
अब जब कोई पूछता है, "भाई, कहीं घूमने चलें?"
इस पर नंदू हँसकर कहता है, "हाँ, अपने सपनों में - वहीं फ्री वाई-फाई और बिना ट्रैफ़िक के सफ़र होता है।"
ध्यान देने योग्य; अगर आप भी यात्रा का प्लान बना रहे हैं, तो कृपया इसे दोबारा पढ़ लें ...और हाँ, चिंटू जैसे मित्र को घर पर ही छोड़ें!
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