महानगर में एक पल्ले के दरवाजे सी जिंदगी: अलोक यात्री

महानगर के इंसान की हैसियत को आंकने, देखने का सबका अलग-अलग पैमाना हो सकता है। लेकिन लगभग दो दशक के दौरान मेरा निजी आकलन यह है कि महानगर में आदमी एक पल्ले का दरवाजा हो कर रह गया है। इस बात का अहसास लगभग दो दशक पूर्व एक लेखक की कुछ पंक्तियों का अपनी खबर से सामंजस्य बैठाते समय ही हो गया था। लेकिन हाल ही में सोनीपत में शिवचरण रतन गुप्ता की मौत के बाद इस बात का यकीन और पुख्ता हो गया है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शहरों में इंसान की स्थिति एक पल्ले के दरवाजे जैसी हो गई है। मेरा बचपन दो पल्लों के दरवाजों के पीछे से शुरू हो कर लगभग छह दशक तक उनसे ही बाहर, भीतर आने जाने में बीता है। आज हिसाब लगाता हूं दो पूरे घर में पांच जोड़ी दरवाजे थे। स्नानघर और शौचालय ही अपवाद थे। आज डुप्लेक्स मकान में एक दर्जन से अधिक एक पल्ले के दरवाजे हैं। बस दूसरी मंजिल पर बने स्टोर में दो पल्ले शर्णार्थियों के रूप में आए थे। जो आज भी यह अहसास दिलाते हैं कि हम हैं ना...।

मुझे दरवाजे और आदमी का रिश्ता पुरातन लगता है। मुझे दरवाजों का इतिहास तो नहीं पता लेकिन मुझे दरवाजे और इंसान के बीच एक मानवीय रिश्ता नजर आता है। मुझे दो पल्लों के पीछे एडम और ईव (आदम और हव्वा) की कहानी छिपी नजर आती है। इसके अलावा दो पल्ले एक दार्शनिक संकेत भी देते हैं। दो पल्लों के दरवाजे कुछ बाहर खुलते थे, कुछ भीतर। आदमी आपके दर पर आए और आप उसके स्वागत में द्वार जब भीतर की ओर खोलते हैं तो अहसास होता है कि आगंतुक का आप अकेले स्वागत नहीं कर रहे बल्कि दोनों पल्ले भी ग्रह स्वामी के साथ स्वाग्तोत्सुक हैं।

इन पंक्तियों की शुरूआत में दो पल्लों के साथ हिन्दी के वरिष्ठ लेखक ब्रजेश्वर मदान का जिक्र आया था। उन दिनों मैं एक अखबार में अपराध संवाददाता था और मसला यह था कि हमारे महानगर में एक पखवाड़े में अप्रत्याशित रूप में दो दर्जन से अधिक आत्महत्या के मामले सामने आए थे। कोई लड़की या लड़का मेडिकल कॉलेज की छत से कूदी या कूदा था, किसी ने हॉस्टल में फांसी लगाई थी। मौत को गले लगाने के जितने भी विकल्प हो सकते थे वह सभी इन प्रकरणों में भी थे। किसी में सुसाइड नोट था किसी में नहीं। घटनात्मक खबर लिखने के बावजूद एक बेचैनी ने मेरे वजूद को अपनी गिरफत में ले रखा था। इनमें से अधिकांश चेहरे जब तब मेरे जेहन पर दस्तक दे देते थे। मैं उनकी मौत की असल वजह तलाशने की जद्दोजहद से जूझ रहा था। लेकिन वजह थी कि हर बार हाथ आते आते छूट जाती थी।

रविवार का दिन था। कार्यालय में मैं अकेला कम्प्यूटर खोले बैठा था। सामने डायरी और एक पखवाड़े से कुछ न लिख पाने की बेबसी...। एक घंटे की कोशिश ने परास्त कर दिया। खबर से ध्यान हटाने के लिए एक अखबार उठा कर पढ़ने लगा। और इत्तिफाक यह कि अखबार का रविवारीय पृष्ठ। शायद अनामिका जी का लेखा था। पूरा तो याद नहीं शुरूआती पंक्तियां यूं थीं- वैसे तो ब्रजेश्वर मदान कहानियों के लिए पहचाने जाते हैं लेकिन इन दिनों कविताएं भी लिख रहे हैं। ब्रजेश्वर मदान से मेरा भी निजी ताल्लुक था। अनामिका को भी पढ़ता रहता था। जैसे जैसे मैं पढ़ता जा रहा था वैसे वैसे मुझे महसूस हो रहा था मेरे भीतर के पल्ले धीरे धीरे खुल रहे हैं। खबर भीतर प्रवेश कर रही है। बकलम ब्रजेश्वर मदान- 'किवाड़'- "दो पल्ले के दरवाजे, अब क्यों नहीं दिखते, गांव में होते थे। खुलते थे सुबह-सुबह, रात में जुड़ जाते थे, पति पत्नी की तरह। यहां एक पल्ले वाले हैं दरवाजे, एक अकेला आदमी हूं मैं, इनसे टिका कर खड़ा होता हूं, पीठ अपनी, क्या जाने इंतजार में किसके। अल्मारियों के दो पल्ले हैं, जैसे मरने से पहले, वह अल्मारी में रख गई हो, अपना घर। दो पल्ले थे खिड़कियों के वैसे तो, पर एक ने पल्ला झाड़ लिया था, मई जून के अंधड़ में, और रह गया था अकेला, वह दूसरा पल्ला..."

और शिवचरण गुप्ता भी चले गए।‌ महाराष्ट्र के रहने वाले शिवचरण गुप्ता अपने समय के मुम्बई के बड़े कपड़ा व्यवसाई थे। वह‌ दो साल पहले सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में एक थे। एक साल पहले उनकी पत्नी मीना गुप्ता ने इसी वृद्धाश्रम में अंतिम सांस ली थी। इस दंपति की संपन्न तीन बेटियां अलग-अलग शहरों में रहती हैं, लेकिन बेगानों की तरह। पत्नी की मौत के बाद शिवचरण गुप्ता भी उस महानगर में दो पल्ले से एक पल्ला ही रह गए। बीते पखवाड़े एक पिता ने अपनी बेटियों से मिलने की आस में दम तोड़ दिया। अंतिम संस्कार के लिए इक्यावन सौ रुपए भेजते हुए उन्होंने अंतिम संस्कार में शामिल हो पाने में असमर्थता भी जता दी। शिवचरण गुप्ता भले ही एक पल्ला रह गए हों लेकिन सोनीपत के निवासियों और वृद्धाश्रम संचालकों ने यह बता दिया कि रक्त संबंधों का एक द्वार जब बंद होता‌ है तो इंसानियत का दूसरा द्वार स्वत: खुल जाता है।

एक पखवाड़े पूर्व एनसीआर की उस सफल मनोचिकित्सक ने घर की बालकनी से कूद कर जान दे दी जो एक पल्ले में तब्दील हो चुके इंसान का बतौर दूसरा पल्ला संबल बनती थी। क्या सफलता और शोहरत की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद उस मनोचिकित्सक की दशा भी एक पल्ले वाली हो कर रह गई, तन्हा... तन्हा... इकला... इकला...

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