कहानी: "पराया धन'

फिर वही सुबह। वही रोज़-रोज़ के काम। उठो, झाडू, पोछा, बर्तन, चाय-नाश्ता, स्कूल जाने वाले भाई-बहनों का लंच पैक। फिर पापा का ऑफिस टिफिन। मम्मी ने धीरे-धीरे सारे घरेलू कार्य अब मेरे ऊपर छोड़ दिए हैं। मम्मी बस ऊपर के काम बाज़ार हाट तक जाना और सब्जी वगैरह धोना काटना तक ही सीमित हो गई हैं। या फिर पड़ोस की औरतों की आंगन में पंचायत लगा कर बैठ जाना। मुझे सुबह से शाम तक बिलकुल समय नहीं मिलता। घड़ी की सुइयों की तरह चलायमान रहती हूं। छह साल हो गए मेरी पढ़ाई बंद हुए। हो भी क्यों न जाती? चाची और दादी की रोज़-रोज़ की हाय तौबा। लड़की सयानी हो गई है, घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं। कुछ ऊंच-नीच हो गई तो गांव बिरादरी में मुंह दिखाने के नही रहेंगे। घर की इज्ज़त अगर एक बार चली गई तो फिर वापिस नहीं आती। बाप-दादाओं का नाम मिट्टी में मिल जाएगा। अब सब की इज्ज़त

का दारोमदार मेरी पढ़ाई और मेरे घर से बाहर निकलने पर आ टिका था।

मैं मन-ही-मन में सोचती कि अब भी बाप-दादाओं का नाम कौन-से स्वर्ण अक्षरों मे लिखा है? गांजा सुल्फा पी-पी कर दादा का समय से पहले ही स्वर्गवास हो गया और पिताजी भी शराब पीने की आदत से लीवर खराब करवा चुके हैं। मगर मेरी नियति में मैट्रिक तक की पढ़ाई ही लिखी थी। दादी ने ऐसा मंत्र पिता जी पर किया कि मेरे लाख अनुनय-विनय पर भी उनका दिल नहीं पिघला और मेरी पढ़ाई बंद करा दी। मैं कितना रोई, कई दिन कुछ भी नहीं खाया-पिया। आख़िर घर की इज्ज़त जीत गई। और मैं हार गई। मैं विद्रोही नहीं हो सकती थी। परिवार के संस्कार जो हजारों पीढ़ियों से समाज में चले आ रहे थे। बेटी पराया धन है, इसकी रक्षा का भार तो पिता, भाई और पति पर है। इसके इतर इसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। मैं इन मजबूत बेड़ियों को कैसे तोड़ पाती? जैसे-जैसे मैं युवा होती जा रही थी, इन बेड़ियों की जकड़न मेरे ऊपर कसती जा रही थी। मगर दिल था कि छोटे भाई-बहनों को पढ़ते देख कर आगे पढ़ने की इच्छा प्रबल हो जाती और हृदय कुलांचे मारने लगता, मगर मैं मोर की तरह अपने पैरों को देखकर रोने लगती।

मेरे आंगन में गुलाब का बगीचा लगा है। उसमें रोज़ नई-नई कलियां खिलती हैं और अपनी सुगंध से पूरे आंगन को महका देती हैं। मेरा मन उन्हें देखकर चहक उठता है लेकिन मुझे तो खिलने से पहले ही तोड़कर फेंक दिया गया। मैं बड़ी हो रही हूं, इसका जितना आभास मुझे नहीं था उतना पास-पड़ोस, गांव, बिरादरी को था। मैं साधारण नयन नक्श की लड़की, बहुत अच्छी नहीं तो बुरी भी नहीं। दादी एक दिन पिता जी को समझा रही थी कि बेटा लड़की जवान हो गई है। कहीं अच्छा रिश्ता देखकर हाथ पीले कर दे। ज़माना अच्छा नहीं है। कुछ ऊंच-नीच हो गई तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। वैसे भी कोई यह हूर परी नहीं है कि कोई भी ले जाएगा। ज़रा उम्र बढ़ी नहीं कि रिश्ते भी नहीं मिलते अच्छे।

पिता जी को दादी की बात सदैव की तरह समझ आ गई। लेकिन उस दिन मेरा मन बहुत व्यथित हुआ। रात भर सुबक-सुबक कर रोई। अपने लिए रूप-रंग की बहुत हीनता महसूस हो रही थी। मां रात को पिता जी से कह रही थी जो मैंने सुन लिया कि हमारी बेटी कोई रूप-रंग की बहुत अच्छी नहीं है। अच्छे दहेज का इंतजाम कर लेना। तब ही अच्छा लड़का मिल पाएगा। नहीं तो लड़की अच्छे घर न ब्याही जा सकेगी। "वाह रे समाज ! दहेज मिल जाए तो गधी भी परी, वरना ढूंढ़ते रहो घर वर। साधारण रूप-रंग को लालचियों, दहेज लोभियों का सहारा।"

मेरे मन में तरह-तरह के प्रश्न आ रहे थे लेकिन विवश थी। पिता जी ने शादी की बात रिश्तेदारों और बिरादरी में निकाल दी। मैं स्वतंत्र नहीं थी। गुलामी की बेड़ियां मेरे पैरों में थी। मैं पढ़ना चाहती थी। पढ़कर शिक्षिका बनना मेरा सपना था। जिससे अपने पैरों पर खड़ी हो सकूं। आज़ादी का रास्ता, आर्थिक स्वावलंबन से होकर जाता है। यह मैं जान चुकी हूं। मैं तो आज़ाद होकर पंछियों की तरह नील गगन में उड़ना चाहती हूं। आसमान को छूना और पुष्पों की तरह खिलना चाहती हूं।

अपनी खिड़की से अक्सर देखती, सजी-धजी मास्टरनी बच्चों के साथ कैसे स्कूल जाती हैं। मुझे उनकी हर भंगिमा में आत्मसम्मान और स्वतंत्रता परिलक्षित होती। मगर खिड़की मेरे लिए जेल के सींखचे और मैं कैदी से अधिक कुछ नहीं । दादी के दो शब्दों "लड़की पराया धन है और पति ही उसका स्वामी है" ने मेरा जीवन नरक कर दिया । पराया धन यथाशीघ्र उसके स्वामी के पास पहुंच जाए तो इससे अच्छा कुछ नहीं...। इसी लीक पर पिता जी चल रहे थे।

चिड़ियों की चहचाहट और पंडित जी के शंख की आवाज से मेरी नींद खुली। घड़ी की सुइयों की ओर देखा तो घड़ी बंद थी। टिक-टिक की आवाज़ भी नहीं। कुछ अनिष्ट का आभास हुआ। दादी बड़े गुस्से से कमरे में आई और बोली, "दोपहर हो गई महारानी सोती ही रहोगी। अब उठ जाओ। नहा-धोकर तैयार हो जाओ। कुछ मेहमान आने वाले हैं।"

मैं चौंक कर उठ गई। घर के दैनिक कार्यों को करने लगी। तभी मां आ गई। बड़े प्रेम से मेरे सर पर हाथ फेरा, मां की आंखों में आंसू थे। मां सिसकते हुए बोली, “बेटी लड़की पराया धन होती है। आज़ नहीं तो कल तुझे अपने घर जाना है। आज़ तुझे देखने लड़के वाले आ रहे है।"

यह सुनकर मुझे ऐसा आघात लगा कि मैं बेहोश होने वाली थी। आंखों के सामने अंधकार छा गया। बात लड़के वालों के देखने आने की नहीं लगी, मां के शब्दों की कटुता मेरे हृदय को चीरती चली गई। दो सेकंड में मां ने मुझे पराया कर दिया और घर से बेदखल। “हाय मेरी यह नियति" कह कर मैं फर्श पर अवचेतन अवस्था में बैठ गई।

लेखक: बख्तावर हनीफ़

सम्प्रतिः सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर उत्तर प्रदेश सरकार के पद पर आसीन

सम्पर्क: 8958543422

(श्री बख्तावर हनीफ़ के दो कहानी संग्रह' हिजाब वाली लड़की," मेरे बचपन के राम प्रकाशित, चालीस से अधिक कहानियां, व्यंग, लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित)

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