इतिहास/राजनीति

वह था "हिबाकुशा"...

◆ श्री आलोक यात्री


ह कहानी त्सुतोमु यामागुची की है। जो हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले के पीड़ित थे। वह स्वयं को "हिबाकुशा" कहते थे। यह कहानी उन्होंने खुद मरने से कुछ पहले दुनिया को सुनाई थी। वह खुद को "हिबाकुशा" क्यों कहते थे, वह आप उनकी ही ज़ुबानी जानिए


"#हां! #मैं_हिबाकुशा_हूं"

'मेरा नाम त्सुतोमु यामागुची है। पूरे जापान में मुझे हिबाकुशा कहा जाता है। वैसे तो मैं आज कसे 16 साल पहले ही इस दुनिया से विदा ले चका हूं। लेकिन आज अगर मैं जिंदा होता तो 110 साल का होता। जापान में इतनी लम्बी उम्र होना कोई ख़ास आश्चर्य की बात नहीं है।

आज से 81 साल पहले का जापान। मैं 29 साल का था। अगस्त की 6 और 9 तारीख़ 1945। तो आज मैं आपको अपनी कहानी सुनाता हूं। एक हिबाकुशा की कहानी...। मतलब वो इंसान जो कि दो-दो परमाणु बमों को भी झेल कर ज़िंदा बच गया।

मैं जापानी नौसेना में ड्राफ़्ट्समैन था। नागासाकी में रहता था लेकिन 6 अगस्त को बिजनेस ट्रिप के सिलसिले में हिरोशिमा में था। सुबह के 8:15 बज रहे थे। मेरी नज़र ऊपर उड़ रहे एक जहाज पर पड़ी, देखा कि उससे एक छोटी सी काली सी कोई चीज नीचे गिर रही है। वह B-29 "एनोला गे" नामक अमेरिकी बमवर्षक विमान था और वह काली चीज थी- "लिटिल बॉय" नाम का परमाणु बम।

पलक झपकते ही जैसे किसी ने मेरी आखों में अंधा कर देने वाली रोशनी झोंक दी हो और मेरे अंग सुन्न पड़ गए। मैंने अपनी उंगलियों से आंखें ढंक लीं और मुंह के बल ज़मीन पर गिर गया, अचानक से धरती हिली और मैं फ़ुटबॉल की तरह उछल कर फिर गिर पड़ा।

मेरे चारो ओर अंधेरा था और मैंने महसूस किया कि मैं बेहोश हो रहा हूं। रेंगते हुए मैं एक पेड़ के तने तक गया और वहीं टेक लगा कर बैठ गया। मैं वैसे ही बड़ी देर तक बैठा ही रहा। सुबह करीब 11 बजे तेज़ बारिश होने लगी। यह एटमिक एक्स्प्लोज़न के प्रभाव से होने वाली बारिश थी। धूल और विस्फोट से उत्पन्न हुए रेडियोएक्टिव तत्व से भरी। यह बिलकुल काली बारिश थी। मैं सरक कर एक गड्ढे में घुस गया। मैंने अपना चेहरा हलके से छुआ, मुझे लगा कि मेरी खाल उतर रही है।

फिर कुछ लोग मुझे लेकर एक क्लीनिक पहुंचे, वहां हर तरफ जले हुए शव पड़े हुए थे। मुझे फर्स्ट एड दिया गया। मेरे कुछ खाते ही उल्टी हो जा रही थी। किसी तरह मैंने वो रात हिरोशिमा में काटी लेकिन अगले दिन अपने घर नागासाकी चला गया। 7 और 8 अगस्त को मैं घर पर ही रहा लेकिन 9 अगस्त को मैं काम पर गया। मेरे पूरे शरीर पर पट्टी बंधी थी। काम के दौरान ही जब मैंने अपने सुपरवाइज़र को हिरोशिमा की बर्बादी के बारे में बताना चाहा तो उसने मुझे पागल कह कर ज़ोर से डांट दिया। तभी ! और तभी... ! नागासाकी पर भी परमाणु बम गिरा। इस बार यह "फैटमैन" नामक परमाणु बम था...


...अब जबकि, परमाणु युद्ध हो चुका है। जिसे मरना था वो मर गया, जिसे ज़िंदा रहते हुए मरना है वह ज़िंदा है। या पल-पल मर रहा है। वह मर रहा है रेडिएशन से। वह अछूत हो गया है, क्योंकि परमाणु बम अब उसके जीन और डीएनए में समा चुका है और उसकी रगों में रेडिएशन बह रहा है। उसे न कोई काम मिलता है न ही कोई रिश्ता।

लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मेरा बेटा कैंसर से चला गया। फिर भी। मैंने द्वंद्व युद्ध सा शुरू किया। भय से। इस दुनिया के भय से। एक दूसरे पर भरोसा न करने के भय से। छद्म और दंभी श्रेष्ठता के भय से।

मैंने बोलना शुरू किया। खूब बोला। अपने गांव से लेकर शहर तक। विश्व भर के छात्रों से। UNO में भी। मैंने बोला, "All for one and one for all" के लिए। मैंने बोला विश्व शांति के लिए। परमाणु निःशस्त्रीकरण के लिए। आने वाली हर पीढ़ी के लिए...

मेरे दुनिया छोड़ने के कुछ ही दिन पहले टाइटैनिक और अवतार जैसी फ़िल्मों के प्रख्यात निर्देशक जेम्स कैमरोन ने एक अस्पताल में मुझसे मुलाक़ात की थी। शायद वो परमाणु बम के हमले में बचे किसी इंसान पर कोई फ़िल्म बनाना चाहते हों। "TWICE" मेरे ऊपर बनी एक ऐसी ही डॉक्यूमेंट्री है।

मैं तो चला गया, लेकिन दुआ करता हूं आगे से किसी फ़िल्म निर्माता को अपनी फ़िल्म के लिए कोई भी एटमी अटैक सर्वाइवर न मिले। कोई एटमी अटैक की घटना न मिले। फिर कोई हिबाकुशा न मिले। एक दिन किसी हिबाकुशा की आवाज़ें हमारे साथ नहीं होंगी, जो हमें बताएं कि क्या हुआ था? लेकिन 6 और 9 अगस्त 1945 की उस सुबह की याद कभी धुंधली नहीं पड़नी चाहिए। वो याद हमें आत्मसंतोष से लड़ने की इजाज़त देती हैं और इससे हमारी नैतिक कल्पना दहकती है।


(Tsutomu Yamaguchi

16/03/1916 - 04//01/2010)

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