गोदी मीडिया के जमाने में सोशल मीडिया खबरों का एक बड़ा स्रोत है
◆ अमरेंद्र कुमार राय

आजकल मैं अखबार नहीं पढ़ता। टीवी पर खबरें देखना बहुत पहले ही छोड़ चुका हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि मुझे लगता है कि अखबार और टीवी सही खबरें नहीं प्रकाशित कर रहे, न दिखा रहे हैं। पिछले करीब 45 सालों से पत्रकारिता में हूं। खबरें जानने के लिए बीबीसी रेडियो से लेकर छह अखबार रोज पढ़ता था। पर अब ? हरिशंकर व्यास के संपादन में छप रहा नया इंडिया अखबार करीब करीब रोज देख लेता हूं। उसमें भी खबरों से ज्यादा आखिरी पेज पर छपा “ राजरंग “ पढ़ता हूं। इससे भारतीय राजनीति में परदे पर और परदे के पीछे चल रहा काफी कुछ समझ में आ जाता है। हरिशंकर व्यास “ जनसत्ता “ में रहे। वहां वे हर इतवार “ गपशप “ लिखा करते थे। तब “ गपशप “ जनसत्ता का लोकप्रिय कॉलम हुआ करता था। उसमें सच लेकिन अपुष्ट खबरें हुआ करती थीं। राजरंग भी वैसा ही कॉलम है।
पत्रकारिता में खबरों का चयन एक महत्वपूर्ण कार्य होता है। कौन सी खबर किस पेज पर और कितनी बड़ी जाएगी, यह खबर की महत्ता के आधार पर तय किया जाता है। लेकिन आजकल ऐसा कुछ हो नहीं रहा। खबरों को महत्ता के आधार पर न तय किया जा रहा न उन्हें उतना स्पेश दिया जा रहा। जो खबर लीड होनी चाहिए वो कहीं बीच के पेज पर सिंगल कॉलम ( बहुत छोटी ) लगा दी जाती है। नहीं तो गायब ही कर दी जाती है। तो जो खबरें पाठकों को जाननी चाहिएं वो अखबार और टीवी में नहीं होतीं। होती भी हैं तो ऐसे पेश की जाती हैं कि पाठकों का उन पर ध्यान ही न जाए। कूड़ा-कबाड़ ज्यादा दिखाया जाता है। टीवी में तो एक नया पैटर्न चल पड़ा है। सरकार जो खबर चलवाना चाहती है वह खबर सूत्रों के जरिये चलवाती है। इस तरह सरकार का अफवाह फैलाने का काम भी हो जाता है और उन गलत खबरों की जिम्मेदारी भी उस पर नहीं होती। ये सारी जिम्मेदारी मीडिया की बनती है। यही वजह है कि मीडिया अपनी साख खो चुका है और मैं न अखबार पढ़ता हूं न टीवी पर खबरें देखता हूं।
फिर खबरों के लिए मैं क्या करता हूं ? जैसा मैंने बताया, नया इंडिया अखबार और उसमें भी उसका “ राजरंग “ पढ़ता हूं। “ भड़ास 4 मीडिया “ “ जन चौक “, “ द वायर “, “ न्यूज लौंड्री “ वेबसाइट भी देखता हूं। भड़ास 4 मीडिया में पत्रकारों, मीडिया जगत और जरूरी खबरें मिल जाती हैं। “ जन चौक “ के संस्थापक संपादक महेंद्र मिश्र अकेले दम पर लेखन और यू ट्यूब दोनों पर ही सराहनीय कार्य कर रहे हैं। सोशल मीडिया - फेसबुक और ट्विटर पर भी बहुत सारी जानकारियां मिल जाती हैं। कुछ यू ट्यूब चैनल भी देखता हूं। अजीत अंजुम, दीपक शर्मा, अभय दुबे का नई परख, सत्य हिंदी, आशीष चित्रांशी का न्यूज लांचर, संजय शर्मा का 4 पीएम, पब्लिक इंडिया, डीबी लाइव आदि देखता हूं। इन्हें देखकर काफी हद तक लगता है कि ये ठीकठाक खबरें दिखाते हैं। लेकिन कई बार ये भी वैसे ही विपक्ष की ओर झुके दिखते हैं जैसे गोदी मीडिया सत्ता पक्ष की ओर झुका हुआ है। फिर भी इनका विपक्ष की ओर झुकना उतना बुरा नहीं लगता जितना मेन स्ट्रीम मीडिया ( मुख्य धारा की मीडिया ) का सत्ता पक्ष की गोद मैं जा बैठना। इसीलिए अब लोग उसे गोदी मीडिया भी कहने लगे हैं। आम लोग भी गोदी मीडिया से चिढ़ने लगे हैं। आपने देखा होगा कि कैसे बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों में लोगों ने गोदी मीडिया से जुड़े पत्रकारों को अपमानित किया और विपक्ष तथा आम लोगों के मुद्दों को उठाने वाले यू ट्यूबरों का स्वागत किया। जेन जेड के आंदोलन में तो यह फर्क और भी साफ-साफ दिखा। जहां गोदी मीडिया से जुड़े कुछ पत्रकारों की पिटाई तक की गई वहीं अजीत अंजुम और कुछ दूसरे यू ट्यूबरों का स्वागत किया गया।
फेसबुक पर हमने कुछ ऐसे मित्रों को जोड़ रखा है जो समय-समय पर कुछ बेहतरीन सामग्री और जानकारी देते रहते हैं। उनकी वाल पर खासकर मैं जाता हूं और देखता हूं। उनमें एक शख्स मनीष आजाद भी हैं। पेपर लीक को लेकर जिन तीन पीएचडी छात्रों ने सोनम वांगुचुक के साथ 23 दिन की भूख हड़ताल की, मनीष उनमें से एक हैं। मनीष इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं। सोमवार को ही इन्होंने अपनी वाल पर एक पोस्ट डाली। कुख्यात यूएपीए के तहत करीब तीन सालों से बंद राजनैतिक बंदी बृजेश और उनकी जीवन साथी अनिता आजाद को लखनऊ हाईकोर्ट से अंतत जमानत मिल गई। इन्हीं की वाल पर एक दूसरी जानकारी है- इलाहाबाद पर एहसान है शेख फरीद बख्शी का। अगर शेख फरीद बख्शी नहीं होते तो इलाहाबाद नहीं होता और होता तो हर साल उज़ड़ चुका होता, बह चुका होता। दो दिन पहले इन्होंने राजनीतिक बंदी खीम सिंह बोरा के जेल से छूटने की जानकारी दी है। ये सात साल बाद जेल से छूटे हैं। मनीष ने ही अपनी वाल पर जानकारी दी है कि अधिवक्ता सुरेंद्र गड़लिंग का 58 वां जन्म दिन जेल में बीता। पचास साल की उम्र में उन्हें जेल भेजा गया था और आज भी जेल में हैं। ये कुछ ऐसी खबरें हैं जो आम तौर पर अखबारों में नहीं दिखतीं। न ही टेलीविजन इन्हें दिखाता है। कुल मिलाकर सोशल मीडिया, यू ट्यूब चैनल और नया इंडिया तथा भड़ास 4 मीडिया से समचार पढ़ने, जानने का अपना काम चल जाता था। लेकिन मेरे मित्र और हिंदुस्तान के पूर्व संपादक प्रमोद जोशी ने यह कहकर मेरी चिंता बढ़ा दी है कि – खबरें और जानकारियां पाने का आपका जरिया यदि केवल सोशल मीडिया है, तो यह खतरे की निशानी है। अब क्या करूं ? समझ नहीं आ रहा। शायद प्रमोद जोशी जी कुछ इस बारे में सुझायें।
फेसबुक पर एक मित्र हैं शालिनी श्रीनेत। कभी एक पोस्ट डालकर कोई सुझाव चाहा था। मैंने इन्हें सुझाव दिया। सुझाव पसंद आया। तब से हमलोगों की बातचीत होने लगी। शालिनी पत्रकार हैं और समाजसेविका भी। “ मेरा रंग “ नाम से अपनी संस्था बना रखी है। लिखती भी बहुत अच्छा हैं। आजकल पोडकॉस्ट पर कुछ नामचीन हस्तियों का इंटरव्यू भी कर रही हैं। महिलाओं के हितों को लेकर काम करती हैं। अभी हाल ही में गाजियाबाद के कनावनी की झुग्गी झोपड़ियों में आग लगी थी तो इन्होंने उनकी काफी मदद की।
“ मेरा रंग “ के एक कार्यक्रम में इन्होंने मुझे आमंत्रित किया। मैं गया भी। कार्यक्रम में हर तरफ महिलाएं ही महिलाएं। मुझ जैसे कुछ बस गिनती के पुरुष। वहां शालिनी से मेरी पहली मुलाकात थी। रविवार की शाम प्रेस क्लब में मुलाकात के लिए अपने मित्रों को बुलाया था। उसमें भी उन्होंने मुझे आमंत्रित किया। दरअसल 25 जुलाई को शालिनी का जन्म दिन होता है। लेकिन जेन जेड आंदोलन के दौरान छात्रों पर बर्बर हमले के कारण इनका मन इतना दुखी हुआ कि अपना जन्म दिन मनाने का इनका मन नहीं हुआ। अब जब सब सामान्य सा हो गया है तो इन्होंने अपने मित्रों को मिलने के लिए बुलाया। वहां मेरी भी बहुत सारे नये लोगों सो मुलाकात हुई। खासकर राहुल पांडे से। फैजाबाद के रहने वाले राहुल पांडे नवभारत टाईम्स में काम करते थे। लेकिन अब नैनीताल के पास मुक्तेश्वर में जा बसे हैं। उन्होंने नैनीताल और आसपास के बारे में बहुत सारी नई जानकारी दी। भडास के यशवंत सिंह के साथ वो इसमें शामिल हुए थे। वर्षों बाद प्रसिद्ध गायिका विजया भारती जी से मुलाकात हुई। उनके पति ओंकारेश्वर पांडे मेरे मित्र हैं। यहां उपस्थित लोगों से भी चर्चा के दौरान बहुत सारी नई जानकारियां मिलीं। जब अखबार, टीवी से जानकारियां न मिल रही हों। अकेले सोशल मीडिया की जानकारी खतरे का संकेत बन रही हो तो शायद मिलना जुलना उसका एक विकल्प हो सकता है।
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