आगे कुआँ, पीछे खाई : द्विधा का द्वार

कहते हैं, सप्तसमुद्रों के पार एक राज्य था, 'द्विधालोक'। वहाँ के मानचित्र पर केवल दो स्थल चिह्नित थे। एक असीम गहरा कुआँ और दूसरी अथाह खाई। बीच की पतली-सी भूमि पर ही राजमहल, बाज़ार, विश्वविद्यालय और नागरिकों के स्वप्न बसते थे।


कुएँ का नाम था 'विकासकूप'। उसमें झाँको तो सोने की सीढ़ियाँ दिखाई देतीं, चमकते नगर, उन्नति के रथ और भविष्य की आतिशबाज़ी। किंतु, जो भी उसमें उतरने का साहस करता, वह पाता कि सीढ़ियाँ धुएँ की बनी हैं और जल की जगह घोषणाओं की गूँज भरी है।


वहीं 'प्रतिज्ञासुर' नामक दैत्य रहता था। हर चुनावी पूर्णिमा पर वह ऊपर आकर अमृत-वचन बाँटता और अमावस्या होते ही फिर गहरायी में विलीन हो जाता।


खाई का नाम था 'असहमतिकंदरा'। उसके किनारे पर चेतावनी-फलक टँगे थे ;


"प्रश्न न पूछें"

"विचार से सावधान रहें"

"सहमति ही सुरक्षा है" ... आदि-आदि।


जो कोई जिज्ञासा का दीप लेकर उधर बढ़ता, उसे 'नारदकाक' घेर लेते; कर्कश स्वर में उसे भू-द्रोही, विधर्मी, भ्रमित घोषित करते। खाई में गिरना आसान था; बस एक स्वतंत्र वाक्य बोलना होता।


खाई में गिराने वाला वाक्य कोई जादुई मंत्र नहीं था; वह बस इतना-सा था; 'क्यों?' या थोड़ा लंबा "क्या हम इससे बेहतर नहीं कर सकते?"


द्विधालोक में यही वाक्य वज्रपात था, क्योंकि जहाँ जयघोष ही धर्म हो, वहाँ प्रश्न अधर्म ठहरता है, जहाँ सहमति ही सुरक्षा हो, वहाँ जिज्ञासा विद्रोह बन जाती है। खाई दरअसल शब्दों से नहीं खुलती थी, वह उस क्षण खुलती थी, जब कोई नागरिक भय से ऊपर उठकर सत्य का एक स्वतंत्र वाक्य बोल देता।


द्विधालोक का राजा बड़ा चतुर था। वह स्वयं को 'लोकनाथ' कहता, और हर सुबह दर्पण में देखकर घोषणा करता, "मैं ही दिशा हूँ, एक अजन्मा स्थितप्रज्ञ।"


उसके दरबार में 'मायामंत्री' रहते, जो आँकड़ों के जादू से कुएँ को सागर और खाई को सरोवर सिद्ध कर देते। दरबार के कवि वीरगाथाएँ लिखते, इतिहासकार भविष्य का लेखा रखते। सैनिकों की जगह शब्दों की सेनाएँ तैनात रहते।


नागरिक विचित्र थे। वह दिन में कुएँ की जय-जयकार करते, रात में खाई के भय से काँपते। बच्चों को स्कूल में सिखाया जाता, "कुएँ की ओर देखो, वही प्रकाश है।"


विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता, "खाई का अस्तित्व मिथ्या है।"


...और जो भी छात्र मानचित्र पर तीसरी राह खींचने की कोशिश करते, उनकी स्याही अदृश्य कर दी जाती।


एक दिन राज्य में एक अनाम बालक आया। उसने न कुएँ में झाँका, न खाई में। उसने बीच की भूमि को खोदना शुरू किया। लोग हँसने लगे, "मूर्ख! यहाँ कुछ नहीं है।"


किंतु, यह क्या! धीरे-धीरे वहाँ से स्वच्छ जल फूट पड़ा। वह न कुएँ का था, न खाई का। वह धरती का अपना जल था; शांत, स्पष्ट, निर्विवाद।


राजा घबराया। मायामंत्री ने घोषणा की, "यह जल भ्रम है।"

नारदकाकों ने काँव-काँव की, "यह विद्रोह है।"


किंतु नागरिक पहली बार उस जल में अपना चेहरा देख रहे थे : बिना विकृति, बिना भय।


तभी उन्हें समझ आया कि कुआँ और खाई दोनों एक ही जादू के दो रूप थे; भय और लालच के। वह इतने वर्षों से दो अतियों के बीच इतना झूलते रहे, कि मध्य की मिट्टी पर ध्यान ही न दिया।


दोस्तो! मित्रो! भाइयो-बहनो! नामो-विद्वानो! चल-अचलो! द्विधालोक अब भी अस्तित्व में है। कुआँ अब भी गहरा है, खाई अब भी चौड़ी।


किंतु, कहीं-न-कहीं कोई बालक अब भी मिट्टी खोद रहा है और जब नागरिक कुएँ और खाई के बीच ठिठकता है, जब उसके पैरों के नीचे भय काँपता है और सिर पर घोषणाओं का शोर गूँजता है, तब उसी धरती की नसों से एक कठोर, निर्मम स्वर उठता है;


"तीसरी राह कल्पना नहीं, साहस है... और साहस का मूल्य सदैव रक्त और प्रतिष्ठा से चुकाया जाता है।"

व्यंग्यकार: डॉ स्वाति चौधरी

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