निभाया नहीं केवल माना जा रहा है धर्म: रवि अरोड़ा


हो सकता है कि धर्म किसी के लिए केवल आस्था का विषय हो मगर दर हक़ीक़त यह है कि धर्म हमारी संस्कृति, सामाजिक जीवन और सामूहिक स्मृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है । इसी रौशनी में जब हम देखते हैं कि मुल्क में धार्मिक पहचान से जुड़े विवाद अब द्वेष, राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष का रूप लेने लगे हैं , तब लोकतंत्र और सामाजिक सद्भाव दोनों के लिए चिंता होने लगती है। हाल ही में सहारनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक पुरानी मस्जिद को जब प्रशासन ने अनाधिकृत निर्माण कह कर गिरा दिया तो अनेक सवाल फिर उठ खड़े हुए। लखटका सवाल तो यही है कि क्या हम में से अधिकांश लोग यह दावा कर सकते हैं कि उसके घर के आसपास का प्रिय धार्मिक स्थल सरकारी जमीन घेर कर नहीं बनाया गया है और उसके निर्माण हेतु जमीन बाकायदा खरीदी गई तथा संबंधित विभाग से विधिवत नक्शा भी पास कराया गया ? सवाल केवल यह नहीं है कि सहारनपुर की मस्जिद का निर्माण वैध था या अवैध। बड़ा सवाल यह है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े संवेदनशील मामलों में आज कितनी निष्पक्षता और पारदर्शिता बरती जाती है ? यकीनन कोई भी धार्मिक निर्माण यदि सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बना है तो उसपर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी ही चाहिए मगर क्या यह नियम मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च सभी पर समान रूप से लागू नहीं होना चाहिए ? क्या ऐसा हो रहा है ?


हाल ही में खबर थी कि उत्तराखंड में गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों पर कार्रवाई की गई । राज्य सरकार का कहना है कि अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था के नए नियमों के अनुरूप उसने बीस मदरसों को सील किया है । उधर, उत्तर प्रदेश में तो साढ़े तीन सौ से अधिक मदरसों, मस्जिदों और दरगाहों को सील अथवा ध्वस्त किया गया । कारण वही अवैध निर्माण का होना बताया गया। राज्य में सड़कों पर सुगम यातायात की दुहाई देकर नमाज तो नहीं पढ़ने दी गई मगर कांवड़ यात्रा के नाम पर इन सड़कों को तांडव करने वालों के हवाले करने में कोई झिझक नहीं दिखाई गई । लाउड स्पीकर विवाद और मस्जिदों के समक्ष उत्पात मचाने की खबरें भी आए दिन सुनाई पड़ ही जाती हैं। गोवा में 2026 का प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून भी चर्चाओं में है। राज्य के अनेक चर्च संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला करार दिया है। महाराष्ट्र में भी धर्मांतरण कानून को लेकर कानून लागू करने की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। हद तो यह हुई कि पुणे पुलिस ने नए कानून के प्रभावी होने से पहले ही उसके तहत कार्रवाई कर दी । उधर , देश में मंदिर-मस्जिद से जुड़े पुराने ऐतिहासिक दावों का सिलसिला भी जारी है। वाराणसी का ज्ञानवापी विवाद, मथुरा का कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद और संभल का शाही जामा मस्जिद विवाद अब केवल स्थानीय मुकदमे नहीं रह गए हैं। ये राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक विमर्श का हिस्सा भी बन चुके हैं। यहां एक बुनियादी प्रश्न उठता है कि क्या आज की पीढ़ी को सदियों पुराने संघर्षों का हिसाब वर्तमान समाज से लेना चाहिए ? यकीनन इतिहास को जानना जरूरी है, इतिहास पर शोध भी जरूरी है और यदि किसी व्यक्ति या संस्था के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इतिहास के विवादों को सड़क की राजनीति, धार्मिक उन्माद और चुनावी ध्रुवीकरण में बदल देना क्या देश के लिए उचित है ?


मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर का मामला हो या आगरा में ताजमहल के सामने धार्मिक अनुष्ठान करने का विवाद, साबित करते हैं कि ऐतिहासिक स्मारक भी अब धार्मिक पहचान की राजनीति से अछूते नहीं रह गए हैं। मुल्क की राजनीति उस मुकाम पर पहुंचा दी गई कि जहां कट्टरपंथियों के दोनों हाथों में लड्डू पहुंच गए हैं। एक पक्ष धार्मिक असुरक्षा का भय पैदा करता है तो दूसरा पक्ष बहुसंख्यक अस्मिता के खतरे की बात करता है। परिणाम यह हुआ है कि वास्तविक समस्याएं बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आय और आर्थिक असमानता राजनीतिक विमर्श में कहीं पीछे चली गई हैं । अजब तमाशा है कि धर्म कानून से ऊपर और राजनीति संविधान से ऊपर दिखाई देने लगी है। जमाने से हम दोहरा रहे हैं कि भारत की ताकत उसकी धार्मिक विविधता है। बारम्बार स्वीकार करते हैं कि मंदिर के साथ मस्जिद, गुरुद्वारे के साथ चर्च और मठ के साथ दरगाह का अस्तित्व इस देश की सामाजिक वास्तविकता है, मगर फिर भी इस विविधता को समाप्त करके कोई एकरूप धार्मिक राष्ट्र बनाने की बात करने वालों के साथ हो लेते हैं। क्या भारत को आज एक ऐसे सार्वजनिक विमर्श की जरूरत नहीं है जिसमें बेशक आस्था का सम्मान हो, लेकिन कानून सर्वोपरि हो । इतिहास का अध्ययन हो, लेकिन बदले की भावना न हो । धार्मिक स्वतंत्रता हो, लेकिन किसी भी सूरत वह दूसरे की स्वतंत्रता की कीमत पर न हो । कभी सुना करते थे कि धर्म मानने की नहीं वरन् निभाने की चीज है। मानने में तो कुछ अधिक करना ही नहीं पड़ता । पूजा पाठ करो, व्रत रखो और दान पुण्य करो, आदि आदि । मगर निभाने में ही असल मेहनत है। किसी के साथ गलत मत करो। किसी का हक न मारो और दूसरों के सुख की न केवल कामना करो अपितु अपनी और से भी उसके लिए प्रयास करो। क्या हम दावे से कह सकते हैं कि आज के दौर में धर्म निभाया जा रहा है ?

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