कितना बचा है लोकतंत्र: अमरेंद्र कुमार राय

अभी हाल ही में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से सवाल पूछने पर दिल्ली पुलिस ने दो महिला पत्रकारों की जमकर पिटाई की। देश की राजधानी नई दिल्ली में ही भारत सरकार के पूर्व नौकरशाह आशीष जोशी को उठा लिया जाता है। उठाता भी कौन है ? पुलिस वाले। वो भी सादी वर्दी में। आशीष जोशी जब सुबह की सैर कर रहे होते हैं तभी दो पुलिस वाले सादी वर्दी में आते हैं और उनसे थाने चलने को कहते हैं। बताते हैं एक ट्वीट के सिलसिले में थोड़ी पूछताछ करनी है। जब वो घर पहुंचने और वहां से चलने की बात करते हैं तो पुलिस वाले कहते हैं कि ज्यादा समय नहीं लगेगा और वे जोशी को अपने साथ ले जाते हैं। लेकिन छोड़ते हैं शाम को। वो भी जब हंगामा होने लगता है। घर वालों को नहीं पता कि उन्हें कहां ले जाया गया है। उनके एक समय सहपाठी रहे कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित मीडिया को संबोधित करते हुए कहते हैं कि पूर्व नौकरशाह आशीष जोशी का कहीं पता नहीं चल रहा, उनके घर के लोग और हम सब चिंतित हैं। शाम को जब पता चलता है कि उन्हें कहां रखा गया है तो वहां भीड़ जुटने लगती है। तब हंगामे से बचने के लिए उन्हें पुलिस उनके घर भेजवाती है। जोशी का कसूर यह था कि उन्होंने चुनाव आयोग की आलोचना करते हुए एक पोस्ट लिख दी थी। एक दूसरी पोस्ट में उन्होंने इस तथ्य को उजागर कर दिया था कि जेन जी के जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उनके गृह सचिव गोविंद मोहन के बीच आंदोलन से निपटने के तरीके को लेकर गंभीर मतभेद थे।

पुणे में सुरेश पंडित ने कुछ नेताओं के भ्रष्टाचार का वीडियो दिखाया तो उन्हें पुलिस ने रात में एक बजे घर से उठा लिया। पुणे में ही विद्यानंद बापट नाम का एक शख्स सड़क और शहर में शोर प्रदूषण के खिलाफ बोल रहा था। तभी एक दूसरे शख्स ने उसे पीटना शुरू कर दिया। और जब कुछ लोगों ने उसे बचाने की कोशिश की तो वह और ज्यादा आक्रामक हो गया। जांच हो तो यह पता चल सकता है कि वह भी सत्ता के दम पर ही यह सब कर रहा था। दिल्ली में तो हिंदुत्ववादी इन्फ्सलूएंसर स्वतंत्र भारद्वाज ने एक पोडकॉस्ट में खुलेआम स्वीकार किया कि जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान उसने निशु आजाद के पिता का सिर फोड़ दिया और वह जेल भी नहीं गया क्योंकि उसके बीजेपी के बड़े नेताओं से नजदीकी संबंध हैं। उसने इस संदर्भ में बीजेपी नेता और दिल्ली सरकार में मंत्री कपिल मिश्रा, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिया था।

अभी हफ्ते भर पहले सावन बीता है। सावन महीने में कांवडिये भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। उत्तर प्रदेश में इन कांवड़ियों पर फूल बरसाए जाते हैं, सड़कें घेरकर उनके लिए अलग से रास्ता बनाया जाता है, उनकी सेवा के लिए जगह-जगह सड़क पर शिविर लगाये जाते हैं। यहां तक कि उन दिनों यात्रियों की परेशानियों को ध्यान में न रखते हुए सड़कें उनके हवाले कर दी जाती हैं। मेरठ में तो कांवड़ियों के एक ग्रुप ने पुलिस वालों पर हमला भी किया। पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन जब मुरादाबाद के एक सर्किट हाउस परिसर में समाजवादी पार्टी के जिला उपाध्यक्ष हाजी मुहम्मद उस्मान का नमाज पढ़ते हुए वीडियो वायरल हुआ तो उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई। पीडब्लूडी विभाग के सर्किट हाउस प्रभारी अवर अभियंता अनित कुमार ने तहरीर दी कि उनके नमाज पढ़ने से रास्ता बाधित हुआ और यात्रियों को परेशानी हुई। सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर एक मस्जिद को अवैध घोषित करके आनन - फानन में उसे बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया गया। जबकि मस्जिद समिति का दावा है कि वह मस्जिद 150 साल पुरानी है। बजरंग दल के उत्तर प्रदेश के पूर्व प्रांतीय संयोजक विकास त्यागी ने शिकायत की थी कि यह मस्जिद अवैध रूप से कलेक्ट्रेट परिसर में बनाई गई है। जबकि यह एक संवेदनशील सरकारी परिसर है, जहां गोपनीय प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं। उनकी शिकायत पर सिटी मजिस्ट्रेट ने मस्जिद को अवैध घोषित करते हुए इसे ध्वस्त करने का फैसला सुनाया था।

उत्तराखंड के हल्द्वानी की घटना तो आपको याद होगी ही। वहां कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक जनसभा की थी। बाद में बीजेपी से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं ने उस स्थान पर शुद्धिकरण अनुष्ठान किया। 13 अगस्त को खड़गे ने भाजपा पर शुद्धिकरण अनुष्ठान कर उनका अपमान करने का आरोप लगाया। उन्होंने राज्य सभा में कहा कि हल्द्वानी के मैदान में लाखों लोग मौजूद थे। उस समय मैंने किसी समुदाय या धर्म का नाम नहीं लिया। लेकिन मेरे भाषण के बाद आपने ( भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोगों ने ) हल्द्वानी में मंच पर शुद्धिकरण अनुष्ठान करके मेरा अपमान करने की कोशिश की। तब राज्य सभा में सत्ता पक्ष के नेता जगत प्रकाश नड्डा ने खड़गे की बात का जवाब देते हुए कहा था कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। लेकिन हुआ उल्टा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई।

अब देश में ये स्थिति हो गई है कि कोई अपनी इच्छा से पुस्तक या संस्मरण भी नहीं छपवा सकता। यह बात कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे की पुस्तकों के विवाद से साफ साफ जाहिर होता है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया सोनिया गांधी के “ संस्मरण बिलांगिंग : अ जर्नी ऑफ लव “ को प्रकाशित करने वाला था। लेकिन अब वह ऐसा नहीं कर रहा। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि प्रकाशक ( पेंगुइन ) ने पांडुलिपि के एक हिस्से में कुछ संपादकीय बदलाव और अंश हटाने का सुझाव दिया था, जिसे सोनिया गांधी ने स्वीकार नहीं किया। इसी साल की शुरुआत में पेंगुइन ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे के संस्मरण “ फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी “ को छापने से इंकार कर दिया था।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत वोट का अधिकार होता है। लेकिन यह वोट का अधिकार भी अब खतरे में पड़ गया है। मतदाता सूचियां ठीक करने के नाम पर बड़ी तादाद में वोटरों के नाम काटे जा रहे हैं। एसआईआर के तीसरे चरण के तहत जारी की गई ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से पता चलता है कि 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची से 6.15 करोड़ नाम हटा दिये गये हैं। यानी 15.7 प्रतिशत की कमी। उसमें भी खास बात यह है कि मतदाता सूचियों से पता चलता है कि सबसे अधिक नाम उन राज्यों से हटाए गए, जहां पिछले तीन वर्षों में विधान सभा चुनाव हुए। इनमें महाराष्ट्र ( 2024 ), कर्नाटक ( 2023 ), तेलंगाना ( 2023 ), दिल्ली ( 2025 ) और आंध्र प्रदेश ( 2024 ) शामिल हैं। सबसे अधिक नाम दिल्ली से 32.78 प्रतिशत हटाए गए हैं। इसके बाद दादर और नगर हवेली एवं दमन और दीव 29.65 प्रतिशत, तेलंगाना 21.69 प्रतिशत, महाराष्ट्र 21.14 प्रतिशत, कर्नाटक 19.48 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश 19.09 प्रतिशत शामिल हैं। मतलब यह कि हर पांचवें वोटर का नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है। हमने पश्चिम बंगाल में देखा था कि वहां 28 लाख वोटरों को वोट देने से वंचित कर दिया गया। जिसमें से बाद में साबित हुआ कि 91 प्रतिशत वोटर सही हैं। इस तीसरे चरण की सूची के बाद भी कुछ नाम जोड़े और हटाए जा सकते हैं, लेकिन ज्यादा संभावना पश्चिम बंगाल वाला खेल ही दुहराये जाने की है।

पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा है कि चुनाव आयोग द्वारा संचालित की जा रही एसआईआर की प्रक्रिया निश्चित रूप से कानूनी है, लेकिन क्या निष्पक्ष भी है ? उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया वैधानिक संस्थाओं द्वारा अपनाई जा रही “ जिसकी लाठी, उसकी भैंस “ वाली सोच का एक उदाहरण है। लवासा ने ये भी कहा कि अब जिन संस्थाओं के पास कानून की ताकत है, वे यह मानने लगी हैं कि वे जो कुछ भी करती हैं, वही सही है। वहीं एक दूसरे पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरेशी का कहना है कि बनावटी तरीके से इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाना लोकतंत्र के लिए बेहद चिंता का विषय है। उन्होंने कहा मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है यह एक “ स्कैम “ है।

अब आप खुद सोचिये कि देश में लोकतंत्र कितना बचा है।

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