21वीं सदी में रचनात्मक लेखन के विविध आयाम’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन
नई पीढी के रचनाकार शब्द प्रयोग के प्रति सजग रहें: पवित्रा भारद्वाज
दिल्ली (मुक्तिदीप) कमला नेहरु कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘21वीं सदी में रचनात्मक लेखन के विविध आयाम’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन कॉलेज के नव संगोष्ठी कक्ष में किया गया।
इस अवसर पर मुख्य अथिति के रूप में छात्राओं से संवाद करते हुए उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व शिक्षा मंत्री भारत सरकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने वर्तमान सदी में साहित्य, कला और संगीत की उपयोगिता पर बल देते हुए कहा कि ये सृजनशील विधाएं मनुष्य को जिजीविषा और गतिशीलता प्रदान करती हैं. उन्होंने ने प्रकृति के संरक्षण को साहित्य –सृजन से जोड़ते हुए इस बात रेख्नाकित किया कि ‘ जो खराब लग रहा है वही ठीक करना है’ . यह वर्तमान सदी के रचनाकारों के समक्ष चुनौती है. उन्होंने ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा को वैश्विक सुख , शान्ति और समृद्धि के लिए आवश्यक बताया. अपने सरल और सहज संवाद की शैली में डॉ. निशंक ने शब्द और प्रकृति को एक दूसरे का पूरक बताया. वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में निहित युद्ध, पर्यावरण विनाश आदि के निदान में भारतीय जीवन मूल्यों की उपयोगिता पर उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने उत्तराखंड में ‘लेखक गाँव’ की संकल्पना को विश्लेषित किया और इसके द्वारा युवा लड़कियों में आत्मविश्वास एवं गहन सृजनशीलता विकसित होने के कई दृष्टान्त प्रस्तुत किये.
साहित्य अकादमी के सचिव डॉ. वरुण गुलाटी ने विषय प्रवर्तन करते हुए वर्तमान सदी में तकनीक की भूमिका और रचनात्मक लेखन में अंतर्संबंध स्थापित करते हुए साहित्य रचना के नये रूपों का उल्लेख किया. उन्होंने विविधतामूलक रचनात्मकता का उल्लेख करते हुए परंपरागत विधाओं के साथ साथ माइक्रो साहित्य रचना या एक मिनट ऑडियो स्टोरी का उदाहरण दिया. उन्होंने छोटी रचनाओं को ‘कम शब्दों में बड़ी दुनिया खोलने की कला’ कहा. रचनात्मकता में कृत्रिम बुद्धिमता के प्रति उन्होंने रचनाकारों को सचेत रहने को कहा.
संगोष्ठी में विषय प्रवर्तन करते हुए हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर और अधिष्ठाता, प्रो. निरंजन कुमार ने कहा कि लेखक , रचनाकार और कंटेंट क्रिएटर आदि भूमिकाएं वर्तमान सदी के रचनाकारों के समक्ष है. न केवल साहित्य रचना के कई नवीन विधाएं सामने आयी हैं , वरन, सोशल मीडिया की उपलब्धता से नए लेखक- प्रकाशक सम्बन्ध सामने आये हैं. सदी के रचनाकरों में में ‘रचनात्मक बेचैनी’ है . नए रचनाकारों में ‘धैर्य’ की आवश्यकता बताई और ‘झटपट कहानियाँ’ लिखने की जरूरत पर विचार करने को कहा. प्रो. कुमार ने साम्राज्यवाद के नये सांस्कृतिक विस्तार के समक्ष भारत – बोध की चुनौती की चर्चा की. उनके अनुसार आज की पीढी के रचनाकारों में ‘आलोचनात्मक विवेक की जरूरत’ को रेखांकित किया. उनका कहना था कि “ जो देख नहीं पा रहे हैं, उन्हें प्रकाश में लाना एक साहित्यिक - दायित्व है ”. प्रो. कुमार ने साहित्य के माध्यम से सामाजिक समरसता को विकसित करने का आग्रह किया. उन्होंने निजी अनुभवों को शब्द प्रदान कर संवेदना को सार्वजनीन करने की कला को सृजनत्माकता से जोड़ा. उनके मत में भीड़ में अकेलापन, महानगरीय जीवन का विस्तार, सामाजिक संबंधों में संकट , प्रवासन, युद्ध और हिंसा , टेक्नोलॉजी का वृहत प्रभाव आदि को 21वीं की रचनाशीलता के समक्ष संकट के रूप में चिन्हित किया.
कमला नेहरु कॉलेज की प्राचार्य प्रो. पवित्रा भारद्वाज ने सत्र की अध्यक्षता करते हुए नई पीढी के रचनाकारों को शब्द प्रयोग के प्रति सजग रहने का मशवरा दिया. उन्होंने साहित्यिक अभिव्यक्ति को एक सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया का अंग बताया.उन्होंने पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विषय पर लिखने के लिए छात्राओं से गुजारिश की. सत्र में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने भी अपने विचार व्यक्त किये . उनके अनुसार लेखन के प्रति न्याय एक मूलभूत जरूरत है.उन्होंने उत्तर औनिवेशिक और बहु – सांस्कृतिक समाज में रचनात्मक लेखन की चुनौती पर चर्चा की.
संगोष्ठी के समापन सत्र में लेखक और पत्रकार संजीव पालीवाल ने लेखन के नये लोकप्रिय माध्यमों और स्वरूप की चर्चा करते हुए अपराध कथा लेखन की रचना- प्रक्रिया की विस्तार से चर्चा की. उन्होंने लेखन में कल्पनशीलता और आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस की सकारात्मक भूमिका को रेखांकित किया. इस क्रम में लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहानी के गल्प पक्ष की चर्चा की और वर्तमान सदी के लेखन में विधाओं के धुंधलेपन की चर्चा की . उन्होंने लेखन में गुणात्मक और मात्रात्मक अनुपात को ध्यान में रखने का आग्रह किया. उनके अनुसार समाज में समस्याओं की भरमार है और लेखक को लिखने के लिए विषय चुनने हैं. पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय जी ने विश्व साहित्य से कई लेखकों के उदहारण प्रस्तुत करते हुए लेखन को कल्पनाशीलता और लिखने और पढने की संस्कृति से जोड़ा. उन्होंने बाल साहित्य की उपयोगिता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौती पर गहराई से चर्चा की. उन्होंने अन्तरिक्ष यात्री कल्पना चावला से जुडी एक अत्यंत रोच्जक और प्रेरक प्रसंग उपस्थित समूह को सुनाये. लेखक कमल भट्ट कमल ने ग़ज़ल और हाईकू विधा पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया. उन्होंने भारत और विश्व में इन दोनों विधाओं की लोकप्रियता और इतिहास पर साक्ष्य और अपना विशद अध्ययन प्रस्तुत किया. सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखिका क्षमा शर्मा ने किया . अपने अध्यक्षीय संबोधन में क्षमा जी ने बाल साहित्य लेखन से अपने कई अनुभव साझा किये और तकनीकी परिवर्तन के अनुभव बताएं. उन्होंने उस दौर के लेखकों के लेखन और प्रकाशन की स्मृतियाँ शेयर की. उन्होंने स्याही वाले पेन से लिखकर डाक से रचनाएं भेजने और इंतज़ार के लम्हों की बेचैनी के अनुभव बताये. उन्होंने उपस्थित छात्राओं से जीवंत सम्वाद किया.उन्होंने अभिनय शैली में छात्राओं से बातें करते हुए एक बाल साहित्यकार की छवि को प्रस्तुत किया. क्षमा जी ने एक कालजयी रचनाकर की विशेषताओं को चिन्हित किया.
संगोष्ठी का संचालन हिंदी विभाग की सदस्य डॉ. साधना अग्रवाल ने किया. हिंदी विभाग के प्रभारी डॉ. मनोज कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया. कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्राएं, शिक्षक और शोधार्थी निरंतर उपस्थित रहे. कार्यक्रम का आरम्भ दीप प्रज्वलन, दिल्ली विश्वविद्यालय कुलगीत गायन और वन्दे मातरम् गान से हुआ और समापन राष्ट्रगान जन गण मन के गायन से. कुल मिलाकर संगोष्ठी गुणवत्तापूर्ण और बेहद उपयोगी रही. 21वीं सदी की समस्याओं से और लेखन में इनके प्रति व्यवहार से छात्र और अध्यापक अत्यंत लाभान्वित हुए
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