युवाओं को हिंदी एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार, सृजन व उद्यमिता की भाषा के रूप में देखना होगा:ऋषि कुमार शर्मा

“डिजिटल युग में हिंदी : अवसर, चुनौतियाँ और रोजगार” विषय पर सेमिनार का आयोजन

मीरपुर (मुक्तिदीप) हिंदी दिवस के अवसर पर धौलाधार सृजन भारती, हमीरपुर के तत्वावधान में शनिवार को अनुराग पैलेस, तरोपका में “डिजिटल युग में हिंदी : अवसर, चुनौतियाँ और रोजगार” विषय पर विमर्श एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हिंदी के बदलते स्वरूप, डिजिटल तकनीक के बढ़ते प्रभाव, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा हिंदी में उभर रही रोजगार की संभावनाओं पर गंभीर और सार्थक चर्चा हुई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ऋषि कुमार शर्मा, पूर्व उप सचिव, हिंदी अकादमी, दिल्ली ने कहा कि डिजिटल युग हिंदी के लिए चुनौती से कहीं अधिक एक बड़ा अवसर लेकर आया है। आज हिंदी इंटरनेट, सोशल मीडिया, डिजिटल पत्रकारिता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ब्लॉगिंग, पॉडकास्ट, कंटेंट राइटिंग और ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से वैश्विक स्तर पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। उन्होंने कहा कि युवाओं को हिंदी को केवल एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार, सृजन और उद्यमिता की भाषा के रूप में भी देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस भाषा के पास करोड़ों बोलने और समझने वाले लोग हों, उसके लिए डिजिटल दुनिया में संभावनाओं का आकाश सीमित नहीं हो सकता।

धौलाधार सृजन भारती की अध्यक्ष डॉ. संतोष कुमारी ने हिंदी दिवस की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए संस्था की गतिविधियों तथा हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध समाजसेवी डॉ. पुष्पेंद्र वर्मा ने कहा कि हिंदी की व्यापक स्वीकार्यता के लिए तकनीक और भाषा के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को तकनीकी दक्षता के साथ हिंदी की समृद्ध अभिव्यक्ति से जोड़ना समय की आवश्यकता है।

विशिष्ट वक्ता डॉ. विवेक शर्मा, प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय ने 21वीं सदी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका और उसके वैश्विक परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने वर्तमान हिंदी के ‘हिंदी 2.0’ के नए आयामों को रेखांकित करते हुए विभिन्न तकनीकी टूल्स की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मनुष्य द्वारा निर्मित अत्याधुनिक तकनीकी उपकरण है, किंतु यह मनुष्य की वास्तविक बुद्धिमत्ता का स्थान कभी नहीं ले सकेगी। उन्होंने डिजिटल माध्यमों के जरिए हिंदी के विस्तार की व्यापक संभावनाओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया।

विशिष्ट अतिथि मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’, सह संपादक, साहित्य सप्तक ने साहित्य और डिजिटल मंचों के बीच बन रहे नए संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्रकाशन के आरंभ होने से भाषा, साहित्य, साहित्यकार और पाठक-श्रोता के बीच दूरी कम हुई है। डिजिटल माध्यमों ने हिंदी साहित्य के वैश्विक प्रसार के नए द्वार खोले हैं।

डॉ. जितेन्द्र चौधरी ने कहा कि तकनीकी शब्दावली के अभाव के कारण हिंदी की अंग्रेजी पर निर्भरता बनी रहती है। हिंदी में समृद्ध और सहज तकनीकी शब्दावली के निर्माण तथा उसके व्यापक प्रयोग की आवश्यकता है।

परिचर्चा में आचार्य पवन कुमार, सुश्री रजनी बाला तथा सह-संयोजक सुरेंद्र कुमार लता ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने हिंदी में डिजिटल कंटेंट निर्माण, अनुवाद, ऑनलाइन शिक्षण, मीडिया, तकनीकी लेखन, पॉडकास्टिंग और स्वतंत्र रोजगार के नए अवसरों को रेखांकित किया। परिचर्चा में यह बात विशेष रूप से उभरकर सामने आई कि तकनीक से जुड़कर हिंदी न केवल अपनी उपयोगिता बढ़ा सकती है, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए क्षेत्र भी खोल सकती है।

कार्यक्रम का संचालन श्री होशियार सिंह ने किया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षकों, शिक्षाविदों और हिंदी प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। विमर्श ने यह संदेश दिया कि यदि हिंदी समय की गति के साथ तकनीक से कदम मिलाकर चले तो डिजिटल युग उसके लिए चुनौती नहीं, बल्कि वैश्विक विस्तार, नवाचार और रोजगार का सशक्त माध्यम बन सकता है।

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में हिमाचली,संस्कृत और हिन्दी गीतों की सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ-साथ भव्य कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया, जिसका सफल संचालन गज़लकार कार्तिक ने किया। इस अवसर पर हिमाचल के रचनाकारों भारती बहल, विनोद शर्मा, विजना डोगरा, लेखराज शर्मा, विनोद कुमारी, सुखदेव, स्वामी लाल, अशोक सोनी, दिव्या भारती, विशाल कौल सहित दिल्ली से पधारे मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’ ने अपनी कविताओं और ग़ज़लों से ऐसा समां बाँधा कि श्रोता देर तक साहित्यिक रस में डूबे रहे। हिमाचली लोक संवेदना, हिंदी की मिठास और समकालीन जीवन की अनुभूतियों से सजी रचनाओं ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया।

अंत में विपिन कुमार ने सभी आगत रचनाकारों, वक्ताओं, साहित्यकारों और सुधी श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। हिंदी दिवस पर आयोजित यह कार्यक्रम भाषा, साहित्य और तकनीक के त्रिवेणी-संगम के रूप में हिंदी के उज्ज्वल भविष्य का विश्वास जगाता हुआ संपन्न हुआ।

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