महफ़िल-ए-बारादरी" में पर्यावरणीय क्षति व नेपाल की भीषण त्रासदी पर हुआ मंथन

साहित्यकार व बुद्धिजीवी पृथ्वी की चित्कार भी सुने: डॉ माला कपूर "गौहर"

गाजियाबाद (मुक्तिदीप) 'महफ़िल ए बारादरी' में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सुप्रसिद्ध शायर आलोक अविरल ने कहा कि इस कार्यक्रम में भावनाओं की जो नदी बहती है अंत तक पहुंचते-पहुंचते वह भावों का समंदर हो जाती है। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम में पर्यावरण पर जिस सजगता से चिंता जताई गई उसके वैश्विक चेतना के रूप में बदलने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस मंच से उठी चित्कार एक दिन समवेत मुहिम के रूप में सामने आएगी। उन्होंने अपना कलाम पेश करते हुए कहा कि "उसे मार डालो जो हम सा नहीं है- ये मजहब में कब तक खुराफात होगी"।



इससे पूर्व सुप्रसिद्ध शायरा डॉ. माला कपूर 'गौहर' ने बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरण क्षरण पर चिंता व्यक्त करते हुए अपनी कविता 'उम्मीद' के माध्यम से नेपाल त्रासदी को रेखांकित किया था।

सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल नेहरू नगर में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ इंद्रजीत सुकुमार की सरस्वती वंदना से हुआ। श्री अविरल ने नेपाल त्रासदी की ओर इशारा करते हुए कहा 'दिख रहा है दूर तक पानी ही पानी हर तरफ़, शहर सारा जिस जगह पे रोज़ चलता था कभी। जिस जगह मिट्टी के नीचे लाश है बस लाश है, बस वहीं से प्यार का लश्कर गुज़रता था कभी। है जहां मलबा ही मलबा बस वहीं स्कूल था, गल चुका कपड़ा है जो बच्चों का बस्ता था कभी।' मुख्य अतिथि नोमान शौक़ ने कहा 'सारे पागल कर रहे हैं एक दूसरे का इलाज, और जो पागल नहीं हैं उनका मर्ज है लाइलाज। पाल रखी है सभी ने अपने बीमारों की फौज, किस मसीहा से कराने जाइए अपना इलाज।'

संस्था के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंघल ने अपने चिर-परिचित अंदाज में वाहवाही बटोरते हुए कहा 'कोई दुनिया में ऐसी क्यों जिएं अब, जिए तो खुद पर शर्मिंदा रहे अब। मेरी नींदें चुराई जा रही हैं, मेरे सपने भी कोई देख ले अब। मैं खुद को खर्च करना चाहता हूं, गले जो भी मिले कस कर मिले अब।' संस्थापिका अध्यक्ष डॉ. माला कपूर 'गौहर' ने कहा कि यह समय गीत, ग़ज़ल, कविता से निकल कर पृथ्वी की चित्कार सुनने का है। उन्होंने 'उम्मीद' कविता में अपना दर्द कुछ यूं बया किया- 'शहर के और मेरे उन्वान के साथ, जुड़ी हैं आशाएं, दोनों ही देखते हैं सपने, मैं भी और शहर भी,... आनंद मिलता है देख कर, मंसूबे से बांधते, कुछ और नए पुल और नई सड़कें, एक और नई मेट्रो, ...बोएंगे कितना लोहा और हम, मुलायम मखमल धानी आंचल को बंजर बांझ बना कर अपने सपने पूरे करने को, ये कौन उम्मीद से है?' डॉ. उर्वशी अग्रवाल 'उर्वी' ने कहा 'कितने अचरज से भरा शबरी का यह काम, दांतों से वह लिखती रही बेरों पर राम।' 'अंधेरे की हुकूमत आ गई है, चिरागों को बुझाया जा रहा है, डॉ सुधीर त्यागी की गज़ल का यह शेर भी खूब पसन्द किया गया "जब जंग जीत लो तुम भी आकर हमे बताना- कितने मरे इधर से कितने मरे उधर से"

कार्यक्रम का संचालन आलोक यात्री और खुश्बू सक्सेना ने संयुक्त रूप से किया। अपने शेर 'आंखों में इबारत है और दिल में कहानी है, आ जाए अगर वो तो उसको ही सुनानी है। उस चांद का पानी में बस अक्स उतरना है, इक चांद है आंखों में और झील में पानी है' पर खुश्बू ने भरपूर दाद बटोरी। इनके अलावा मोनी गोपाल 'तपिश', वी. के. शेखर, सरवर हसन सरवर, डॉ. तारा गुप्ता,

बी. के. वर्मा 'शैदी', अनिमेष शर्मा 'आतिश', डॉ. ईश्वर सिंह तेवतिया, विपिन जैन, डॉ. सुधीर त्यागी, डॉ. नसीम अहमद खान, सुरेंद्र शर्मा, इंद्रजीत सुकुमार, वागीश शर्मा, डॉ. नरेंद्र शर्मा, विनय विक्रम सिंह, संजीव निगम 'अनाम', संजीव शर्मा, सुमित्रा शर्मा, पवन कुमार तोमर, रजनीश त्यागी 'राज' व मारिया उस्मानी की रचनाएं भी सराही गईं। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध संगीताचार्य हरी दत्त शर्मा को 'बारादरी जीवन पर्यन्त साधना सम्मान' से अलंकृत किया गया।

इस अवसर पर डॉ. स्मिता सिंह, सुभाष चंदर, पं. सत्य नारायण शर्मा, सुभाष अखिल, राधारमण, शकील अहमद सैफ, कुलदीप, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, प्रो डॉ. रत्ना पनिक्कर, सरवत उस्मानी, नीरज कौशिक, प्रो डॉ. सुमन गोयल, प्रो. इला भूषण जैन, फरहत ख़ान, अजय मित्तल, दीपा वर्मा, दीपक मिश्रा, नीलम सिंह, डॉ. ज्योति शर्मा, अंकित तलवार, चैती शर्मा, डॉ. प्रीति त्रिगुणायत व वर्धमान रंजन गुप्ता सहित बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे।

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