कविता: "सोचता हूँ एक घर बनाऊँ पहाड़ों में..:रियाज़ अहमद

"सोचता हूँ एक घर बनाऊँ पहाड़ों में,

जहाँ दुनियां छोटी लगने लगे,

इतनी छोटी कि

उसमें किसी से आगे निकलने की चाह न बचे..

जहाँ सुबह

सूरज के साथ हो,

अलार्म के साथ नहीं,

और शाम

ढलती रोशनी में

अपने बीते हुए कल से मिलती हो..

घर के बाहर देवदार हों,

और भीतर कुछ ख़ामोशियाँ..

जिन्हें भरने के लिए

किसी इंसान की ज़रूरत न पड़े..

बर्फ़ की सफेद चादरों के ढेर में

जमी हुई यादों की परत

धीरे धीरे पिघलते हुए

रूमानी अहसास को रोशन करे..

वहाँ कोई पूछे नहीं

मैंने क्या पाया,

बस इतना काफ़ी हो

कि जो खोया था ख़ुद में,

वह धीरे-धीरे मिलता रहे...

सोचता हूँ एक घर बनाऊँ पहाड़ों में,

जहाँ रास्ते कम हों,

मंज़िलें भी कम,

और लौटकर आने के लिए

बस एक अपना सा दरवाज़ा हो..

जहाँ दुनियां सच में छोटी लगे..

और पहली बार मैं ख़ुद को

थोड़ा बड़ा नहीं,

थोड़ा पूरा महसूस करूँ..!!"

◆ रियाज़ अहमद, शिमला

Disclaimer: The views expressed in this article are the personal opinions of the author and do not necessarily reflect the views of MuktiDeep or its editorial team.