"ज्ञानेश हटाओ" आंदोलन का हस्र क्या होगा ? : अमरेंद्र कुमार राय

मेरे एक मित्र हैं। बड़े सरकारी पद से रिटायर हुए हैं। 75 की उम्र है। स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं रहता। शांत स्वभाव के हैं। ऐसा भी नहीं कि राजनीति में बहुत दिलचस्पी हो। रिटायर होने के बाद उन्होंने कई सारी डिग्रियां लीं। उनमें कुछ डिग्रियां संगीत की भी हैं। अब समय पास करने के लिए बच्चों को संगीत सिखाते हैं। कविताएं भी लिखने लगे हैं। उनकी कविताओं की एक पुस्तक भी आ चुकी है। लेकिन देश को लेकर हमेशा चिंतित रहते हैं। वे मानते हैं कि यह सब जो हो रहा है देश हित में नहीं है। चारो तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला है। देश को बुरी तरह से लूटा जा रहा है। लोकतंत्र में एक उम्मीद होती है कि जनता जब चाहे, शासकों को बदल दे। लेकिन वह उम्मीद भी जाती रही। क्योंकि अब सरकार जनता के वोट से नहीं वोट चोरी से बन रही हैं। उनकी चिंता का यही विषय है। जेन जी के आंदोलन से उन्हें बहुत राहत मिली थी। वे मानने लगे थे कि जेन जी इस व्यवस्था में बदलाव और सुधार ला सकता है। पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद से तो उनका उत्साह कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। जिस तरह से जेन जी ने वोट चोरी रोकने और ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ने की घोषणा की, उन्हें लगा कि अब कुछ होकर रहेगा। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के ज्ञानेश हटाओ आंदोलन से भी उन्हें बहुत उम्मीदें जगीं। लेकिन सरकार की तैयारी और उसका रुख देखने के बाद उनकी नाउम्मीदी बढ़ रही है। वे अक्सर मुझसे पूछते हैं कि अब इस आंदोलन का क्या होगा ? क्या ज्ञानेश कुमार हटेंगे ? क्या मुख्य चुनाव आयुक्त की चयन प्रक्रिया बदलेगी ? या एक ज्ञानेश कुमार जायेंगे और दूसरे ज्ञानेश कुमार आयेंगे ? एसआईआर का क्या होगा ? क्या ये हटेगा ?

मैं उन्हें बार-बार आश्वस्त करता हूं। चिंता मत करिये। थोड़े धार्मिक हैं तो मैं हंसते हुए कहता हूं-गीता का श्लोक याद रखिये। जो हुआ, वो अच्छा हुआ, जो हो रहा है वो भी अच्छा हो रहा है, आगे जो होगा, वो भी अच्छा होगा। ये जनता है सब जानती है। बड़े बड़ों को ठीक किया है। इन्हें भी ठीक करेगी। कोई भी नदी जब अपने उद्गम से निकलती है तो बहुत बड़ी नहीं होती। उसमें वेग बहुत ज्यादा नहीं होता लेकिन जब वह आगे बढ़ती है तो उसमें बहुत सारे नाले, नदियां आकर मिलते हैं और वह विशाल रूप धारण कर लेती है। इतना कि बड़े से बड़े पेड़ और चट्टानों को उखाड़ कर बहा ले जाती है। आंदोलनों का स्वरूप भी ऐसे ही होता है। अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन करने और उनके खिलाफ लोगों को जगाने के लिए कांग्रेस की स्थापना की गई। तब कांग्रेस नख-दंत विहीन थी। कुछ लोगों ने इसे अंग्रेजों की दलाली के लिए बनाया गया संगठन तक कहा। खुद इसके संस्थापक ए ओ ह्यूम ने कहा था कि यह प्रेशर कुकर के सीटी की तरह है। ताकि लोगों का गुस्सा बाहर निकल जाए और सिस्टम का प्रेसर कुकर न फटे। लेकिन हुआ क्या ? बाद में आंदोलन इतना तेज हुआ कि अंग्रेजों को देश छोड़कर भागना पड़ा। इसी तरह बिहार के छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए इंदिरा गांधी ने आपात काल लगा दिया। सारे विरोधी नेताओं को जेल भेज दिया। फिर भी क्या हुआ ? जनता ने चुनाव होते ही उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया। तो यहां भी यही होना है। आप सोच रहे होंगे कि अब तो जनता के पास वोट देने का भी अधिकार नहीं रहा, जिसे ज्ञानेश कुमार चाहेंगे, वो वोट देगा, जिसे नहीं चाहेंगे, उसका नाम मतदाता सूची से कट जाएगा। 13 करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम कट ही गये हैं। इसमें सुधार की गुंजाइश भी नही बची है। फरियाद लेकर लोग जब सुप्रीम कोर्ट जाते हैं तो वह कहता है कोई बात नहीं। यह अन्याय होने दो, 27 करोड़ लोग अबकी बार नहीं अगली बार वोट डाल लेंगे और पश्चिम बंगाल में सरकार पलट दी जाती है। वोटों से नहीं चुनाव आयोग के खेल और सुप्रीम कोर्ट के परोक्ष समर्थन से। लेकिन इससे भी घबड़ाने की जरूरत नहीं है। हिरण्यकश्यप ने ऐसा वरदान मांगा था कि उसकी मौत हो ही नहीं सकती थी। लेकिन वह भी मरा। रावण की तो नाभि में अमृत था, बावजूद इसके वह मारा गया। बालि सामने से लड़ने वाले का आधा बल ले लेता था। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान था, अश्वस्थामा अमर था, बर्बरीक महान योद्धा था, लेकिन जिसने भी अत्याचार किया, पाप किया उसका अंत हुआ। कोई न कोई रास्ता जरूर निकला। यहां भी निकलेगा।

1973 में जब गुजरात में छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ तो कौन कह सकता था कि यह आंदोलन इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर नेता को आपातकाल लगाने पर मजबूर कर सकता है। 1974 में बिहार में जब छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ तो भी कौन जानता था कि यह आंदोलन इतना बड़ा रूप ले लेगा। सरकार की संगठित शक्ति के सामने यह आंदोलन कुछ नहीं था। सरकार जब चाहती इसे कुचल सकती थी। पर जब छात्रों पर लाठी चार्ज हुआ, जय प्रकाश नारायण छात्रों का नेतृत्व करने को तैयार हुए तो उसका स्वरूप बदल गया। तो आप इस आंदोलन को भी इसी रूप में देख सकते हैं। पहले जेन जी और वामपंथी छात्र इस आंदोलन को चला रहे थे। बाद में इस आंदोलन को कांग्रेस ने मजबूती प्रदान की। फिर इसमें सिविल सोसाइटी, बुद्धिजीवी और किसान भी शामिल हो गये हैं। अब स्थिति यह हो गई है कि सरकार भी इस आंदोलन से घबराने लगी है। इंडिया गठबंधन ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली करने का एलान किया है। सरकार की कोशिश यह है कि यह रैली ही न हो पाये और अगर हो तो इसे फेल कर दिया जाए। उसने व्यापारी संगठनों से राहुल गांधी को पत्र लिखवाया है कि दीवाली के मौसम को देखते हुए वे रैली को टाल दें, वरना उनका कारोबार प्रभावित होगा। लेकिन सबको पता है कि उनका पत्र राजनीति से प्रेरित है। एक दिन चार घंटे की रैली से कोई कारोबार प्रभावित नहीं होगा वह भी हफ्ते भर पहले। बल्कि कारोबार बढ़ ही सकता है। क्योंकि नजदीकी क्षेत्रों से जो लोग आयेंगे वो दीवाली की खरीददारी भी यहीं से कर सकते हैं। फिर भी अगर रैली होती है तो सरकार उसे येन-केन प्रकारेण रोकने, लोगों को न पहुंचने देने की कोशिश करेगी क्योंकि दिल्ली समेत सभी पड़ोसी राज्यों में उसी की सरकारें हैं। वैसे तो यह पूरे इंडिया गठबंधन की रैली है लेकिन कांग्रेस इसे अपने दम पर ही सफल बनाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस की चार राज्यों में सरकार है। सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इस रैली में शामिल होंगे और वहां से भीड़ भी जुटाई जाएगी। दिल्ली में कोई भी रैली इसके नजदीकी राज्यों - हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से ही सफल हो पाती है। कांग्रेस ने इसके लिए तीनों राज्यों के प्रमुख नेताओं को भीड़ का टारगेट तय कर दिया है। अकेले हरियाणा से एक लाख लोगों को लाने का टारगेट रखा गया है। उत्तर प्रदेश में चूंकि चुनाव है तो टिकट चाहने वाले भीड़ लेकर आयेंगे। अभी कांग्रेस ने हाल ही में इमरान मसूद को पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है तो उन्हें अपने आप को भी साबित करना है। वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से लोक सभा सदस्य हैं और भीड़ जुटाने में यूपी से लेकर दिल्ली तक जुट गये हैं। राजस्थान में स्थानीय निकायों के चुनाव चल रहे हैं, इसलिए वहां के नेताओं को भीड़ जुटाने में जरूर थोड़ी दिक्कत आयेगी। उसके बहुत सारे नेता हो सकता है रैली में भी शिरकत न कर पायें। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता पार्टी के तेजस्वी यादव ने भी अपने कार्यकर्ताओं से रैली में भाग लेने की अपील की है। तो ज्यादा संभावना है कि रैली बहुत अच्छी हो जाएगी।

अगर रैली सफल होती है, जिसकी संभावना बहुत ज्यादा है तो आंदोलन का रूख और बदलेगा। सरकार पर दबाव और बढ़ेगा। उसे आगे आना ही होगा, विपक्ष से बातचीत करनी ही होगी। तभी वह अपनी सरकार बचा पायेगी। आप देखें पहले मांग थी सिर्फ ज्ञानेश कुमार को हटाने की। उस समय सरकार सिर्फ ज्ञानेश कुमार को हटाकर आंदोलन से पीछा छुड़ा सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। अब उसमें मुख्य चुनाव आयुक्त की चयन प्रक्रिया में बदलाव और एसआईआर खत्म करने का मुद्दा भी जुड़ गया है। कहीं ऐसा न हो कि और देर करने से इस मांग में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग भी जुड़ जाए। घाव जब होता है तो शुरू में ही उसका इलाज कर देना चाहिए। वरना जब वह नासूर का रूप ले लेता है तो हाथ-पांव तक काटने पड़ते हैं। यहां तक कि कई बार जान तक चली जाती है। अब देखना यह है कि सरकार घाव का इलाज अभी करती है या इसे नासूर बनने देती है।

Disclaimer: The views expressed in this article are the personal opinions of the author and do not necessarily reflect the views of MuktiDeep or its editorial team.